Wednesday, April 6, 2011

ज्ञान और विवेक सम्बंधित हैं

मेरे एक मित्र, जो एक बड़े होटल में जनरल मैनेजर हैं, मुझे मिले। चर्चा होते-होते यह बात निकली कि आजकल अच्छे और भरोसेमंद कार्य-करता नहीं मिलते, इसलिए अधिकारी स्टाफ को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। उनका कहना था कि निचले दर्जे के काम करने वाले कर्मी बिलकुल कोई ज़िम्मेदारी लेने का कष्ट ही नहीं करते। वह काम का अंतिम लक्ष्य तो समझते ही नहीं। हर बात के लिए बहाने और काम न होने के कारण उनके पास हमेशा रहते हैं। मैंने कुछ सोच कर उन्हें सलाह दी - मुझे लगता है कि आपका स्टाफ शायद पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं होता। यदि आप उनके लिए कौशल-दक्षता का कोई प्रशिक्षण कर सकें तो शायद स्थिति में कुछ सुधार हो । शायद उन्हें बात अच्छी लगी। और यह मुझे अच्छा लगा कि जल्दी ही उन्होंने अपने कुछ कर्मचारियों के लिए एक ट्रेनिंग का बंदोबस्त कर डाला। कुछ समय बाद उनसे फिर मिलना हुआ। उनके अनुभव पर भी बात हुई। अबकी बार उनकी समस्या कुछ अलग किस्म की थी। उनका कहना था कि प्रशिक्षण के बाद लड़कों की कार्यकुशलता में तो ज़रूर वृद्धि हुई है , किन्तु हमें लगता है कि अब उनकी अवेयर-नेस इतनी बढ़ गयी है कि कभी-कभी तो उनका व्यवहार अति-चतुर, अर्थात ओवर- स्मार्ट व्यक्ति का व्यवहार हो गया है। वे अपने हितों के प्रति ज़रूरत से ज्यादा जागरूक हो गए हैं। न्यूनतम कार्य में अधिकतम पैसा चाहते हैं। मैंने उनसे कहा- कहीं ऐसा तो नहीं है कि आप उनसे न्यूनतम पैसे में अधिकतम काम की अपेक्षा करते हों? उन्हें जवाब देने में कुछ संकोच हुआ। मुझे लगता है कि हमें किसी की 'ईमानदारी ' को चुनौती देने से पहले अपनी ' नीयत ' को भी तौल लेना चाहिए।

2 comments:

  1. हमें किसी की 'ईमानदारी ' को चुनौती देने से पहले अपनी ' नीयत ' को भी तौल लेना चाहिए।

    So true !

    .

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