Friday, April 8, 2011

व्यक्ति-पूजा अमेरिका में आदत नहीं बनी

उन दिनों मैं न्यूयार्क में था।मुझे वहां संयोग से ग्रोव सिटी स्थित प्राचीन विश्व विद्यालय के एक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। न्यूयार्क से देत्रोइत और पिट्स बर्ग होते हुए मैं ग्रोव सिटी पहुंचा। कार्यक्रम शुरू होने से पहले वहां सभी आगंतुकों के लिए भोज आयोजित था। भोज एक भव्य और विशाल कक्ष में था। इस कक्ष में प्रवेश करते ही मैंने देखा की एक मेज पर एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अकेले बैठे हैं। मैं उसी मेज पर बुज़ुर्ग सज्जन के साथ बैठ गया। हमने साथ भोजन किया। वहां सभी लोग तरह-तरह से बातचीत में मशगूल थे। भोजन के बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब मैंने देखा कि वही अलग-थलग अकेले से बैठे व्यक्ति कार्यक्रम के मुख्य-अतिथि हैं।मेरे शरीर में कार्यक्रम - भर संकोच की एक सिहरन सी बनी रही। क्षमा करें, मुझे भारत में अपने देखे ऐसे कई प्रसंग याद आ गए जब मैंने मुख्य-अतिथियों के इंतजार में छोटे स्कूली बच्चों से लेकर युवाओं और बुजुर्गों तक को घंटों इंतजार करते देखा था। यहाँ जब तक मुख्य-अतिथि न आ जाये आयोजकों के लिए श्रोताओं-दर्शकों का समूह एक उपेक्षित झुण्ड की तरह होता है। मुख्य-अतिथि नमूदार होते हैं तो उनके साथ उनके चाटुकारों और "शुभ-चिंतकों" का बेतरतीब हुजूम इस तरह होता है कि किसी गुड की भेली पर मक्खियों का अहसास होता है। कभी- कभी तो उनके आने की घोषणा इस तरह जोर-जोर से होती है मानो लोगों को नेस्त-नाबूद करने सुनामी चली आ रही हो। वे वहां उपस्थित लोगों के लिए नहीं बल्कि उनके साथ चिपके लोगों के लिए आये हों। मुख्य-अतिथि राजनैतिक क्षेत्र से ही हों , यह तो महज़ फैशन की बात है।

2 comments:

  1. जी हाँ, यह समझदारी की बात है की मुख्य अतिथि भी सरल,सहज और साधारण व्यक्ति का सा व्यवहार करे तो अच्छा लगता है.बहुत बड़ा चढा कर मुख्य अतिथि को पेश किया जाये,या मुख्य अतिथि अपने को कुछ अलग सा समझे यह सब बनावटी और असहज सा लगता है,जिससे आत्मियता नजर नहीं आती.

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  2. aapka blog ' mansa vacha karmana ' maine aaj hi padha hai, mujhe bahut achchha lag raha hai ki aap jaisa vidvan vyakti meri baat me aur vazan rakh raha hai.

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