Monday, April 11, 2011

अमेरिका से तुलना???

देश के कई बुजुर्गों को याद होगा कि फिल्मों में धुआधार सफलता की पारी खेलने के बाद वैजयंतीमाला ने डॉ बाली से शादी कर ली थी जिनके पहले से ही सात बच्चे थे।सफलता के सर्वोच्च शिखर से हेमामालिनी ने धर्मेन्द्र का रुख किया था , जिनके पहले से कई बच्चे थे। सुष्मिता सेन ने तो केवल माँ की भूमिका लेकर दुनिया रची। कहने का तात्पर्य यह है कि औरत हर समय पुरुष पर आश्रित या पुरुष के इर्द-गिर्द अपनी दुनिया समझती हुयी नहीं रही। ऐसे सारे उदाहरण केवल फिल्म-क्षेत्र के ही नहीं हैं, बल्कि हर तबके के हैं।मैं तो कहूँगा कि अब ऐसी बातें करना ही दकियानूसी ख्याल है कि औरत अपने पैरों पर खड़े होने की सामर्थ्य रखती है। यह तो है ही। ऐसा तब होता है जब हम मानसिक शक्ति को शारीरिक शक्ति की तुलना में ज्यादा कारगर माने।और हमारे मानने न मानने का सवाल भी कहाँ है, यह तो है ही। किसी शेर की मांद में कहीं कोई आदमी नहीं पल रहा, लेकिन आदमी के पिंजरों में शेर पल रहे हैं। ज़रा गौर से सोचेंगे तो आप पाएंगे कि विकसित देशों का यही फलसफा है।औरत की दुनिया से कट कर सफलता का कोई रास्ता कहीं नहीं जाता। माँ की अंगुली पकड़ कर बच्चा जो सीखता है, वह केवल पिता के साथ नहीं सीख पाता । बड़े आश्चर्य की बात है कि भारत में लड़कियों को मारा जा रहा है। जनसँख्या गणना ने जो नतीजे दिखाए हैं, वे साफ कह रहे हैं कि भारतीय परिवारों में कन्या-रत्न की ज़रूरत समाप्त समझी जा रही है। औरत के शक्तिशाली होने का एक प्रमाण तो यही है कि इस कारोबार में भी उसीकी भूमिका ज्यादा सामने आ रही है। माफ़ करें, इस जीवन-द्रष्टि की तुलना अमेरिका तो क्या, किसी भी विकसित देश से नहीं की जा सकती। इस का हल सोचे बिना कहीं कोई गंतव्य नहीं है।लोगों का ऐसा झुण्ड कोई कबीला तो हो सकता है, देश नहीं।

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