Friday, February 8, 2013

समझदारी का काम बच्चों का

"बूढ़ा जब अपने जाने के दिन नज़दीक देखने लगा तो उसने सोचा, अपने बच्चों को ऐसा कुछ सिखा जाऊं, कि  मेरे जाने के बाद ये आपस में लड़ें नहीं, और मिल-जुल के रहें। बहुत सोचने पर उसे वही सीख याद आई, जो कभी उसके पिता ने उसके बचपन में उसे दी थी।
उसने अपने सभी बच्चों को बुला कर एक-एक छोटी लकड़ी की टहनी दी, और कहा, इसे तोड़ो। सभी ने आसानी से उसे तोड़ दिया। फिर बूढ़े ने वैसी ही कुछ लकड़ियों का गट्ठर देकर सभी से उसे तोड़ने को कहा। कोई न तोड़ पाया।
बूढ़े ने खुश होकर कहा- देखो, इन्हीं लकड़ियों की तरह यदि सब एकसाथ मिलकर रहोगे, तो कोई तुम्हें नुक्सान नहीं पहुंचा सकेगा। इस सीख को देने के चंद दिनों बाद बूढ़ा स्वर्ग सिधार गया।"
यह कहानी सुना कर वैताल विक्रम से बोला-"राजन, चंद दिनों बाद चुनाव आ रहे हैं। सरकार से सभी दुखी हैं।अब मौका है कि सब मिलकर उसे हटादें, लेकिन सब अलग-अलग दल बना कर सरकार को ललकार रहे हैं, इस तरह तो ये सब हार जायेंगे। ये बूढ़े की सीख पर अमल क्यों नहीं करते?"
विक्रम ने कहा-" शिक्षाप्रद कहानियां तो बच्चों को सिखाई जाती हैं, लेकिन बच्चे वोटर नहीं होते।"
वैताल ने कहा- "ओह!" इतना कहकर वह फिरसे उसी सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में जाने की तैयारी करने लगा।      
   

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