Thursday, February 21, 2013

विध्वंस होने पर सम्पादकीय लिखने का चलन

हैदराबाद में कई निर्दोष मारे गए या लहूलुहान हो गये। जो मरे, वे नहीं जानते थे कि उनका जीवन क्यों समाप्त किया जा रहा है।जो घायल हो गए, उनको यह अंदेशा नहीं था कि  आदमियों की बस्ती में भी शेर, भेड़िये या लकड़बग्घों  की तरह फैसले लिए जा सकते हैं।
जब किसी को कोई नया देश या प्रांत मिल जायेगा, तब कहीं से कोई फ़रिश्ता आकर उन मृत-आत्माओं से यह नहीं कहेगा, कि  चलो, हमारा काम हो गया,अब जी उठो।
फिर भी ऐसा नहीं है कि  हम कुछ कर ही न सकें, रस्ते तो कई हैं,हम सन्देश दें, सम्पादकीय लिखें, खेद प्रकट करें, आरोप-प्रत्यारोप लगाएं, उन बच्चों और विधवाओं से मिल आयें, जो अनाथ और बेसहारा हो गए। और यदि आस-पास चुनाव हो रहे हों, तो चंद मुट्ठी अशर्फियाँ ...क्षमा कीजिये, नोट बाँट आयें।  

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