Saturday, February 23, 2013

गोश्त के बुलबुले

धरती पर आदमी बहुत समय से  है।  न जाने कब तक रहेगा। किसी को आपत्ति नहीं है, अनंत-काल तक रहे।
लेकिन कम से कम इस तरह तो रहे कि  उसके होने के अक्स मृत-आत्माओं की आँख की पुतलियों में तो न बनें। पर बन रहे हैं, कुछ लोग इसी तरह जीना पसंद करते हैं।
कुछ लोग भटक जाते हैं। वे जीवन की ज़मीन पर अपने दस्तखत करने के लिए दूसरों के लहू का इस्तेमाल  करते हैं। वह अपना सोच-राग गाने के लिए निर्दोष चमड़ी के ढोल मढ़ते हैं। वे दूसरों के तन की राख पर अपना बेहूदा तांडव करते हैं। वे अपने पैदा करने वालों और पालने वालों के लिए तामसी कलंक रचते हैं।
वे दुनिया के इतिहास में इस तरह याद किये जायेंगे, कि  हाँ, जीवन की बहती नदी में कुछ गोश्त के बुलबुले दिखे थे कभी।
हैदराबाद के ज़ख्म भरें, ऐसी शुभकामनाएं।

1 comment:

  1. बिल्कुल सही कहा आपने

    ReplyDelete

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...