Wednesday, February 22, 2012

क्या हमें विश्व-स्तरीय शहर ही पसंद हैं?

हम अक्सर सुनते रहते हैं कि विकास के लिए हमारे अमुक शहर को चुना गया है और अब उसे विश्व-स्तरीय शहर बनाने के लिए सघन प्रयास किये जायेंगे. इसी के साथ शुरू होता है उस शहर को आधुनिक सुख-सुविधाओं से पाट देने का सिलसिला.देखते-देखते शहर अपने विकास के दिन दूने-रात चौगुने बजट के साथ कायाकल्प में जुट जाता है. यह अच्छी बात है. अगर हमारे कुछ शहर यूरोप के शहरों की तरह साफ-सुथरे, अमेरिकी शहरों की तरह भव्य, जापानी शहरों की तरह उन्नत या रशियन शहरों की तरह शालीन दिखें तो भला किसे ऐतराज़ होगा?
लेकिन यहाँ एक छोटा सा सवाल है. क्या हमारी दिलचस्पी केवल अपने 'शहरों' के कायाकल्प में ही है? क्या हम अपने ग्रामीण इलाकों के प्रति ज़रा भी चिंतित नहीं हैं.
अमेरिका में एक शहर से दूसरे शहर की ओर जाते हुए जब हम रास्ते के "गाँवों" को देखते हैं तो हमें एक पल के लिए भी यह ख्याल नहीं आता कि यहाँ जिंदगी कुछ कम सुख-सुविधाओं के साथ रहती है. केवल अंतर इतना दिखाई देता है कि गाँव में लोग कुछ कम सघनता के साथ, थोड़े ज्यादा फासले पर रहते हैं. न तो उनके जीवन स्तर में विपन्नता या पिछड़ापन दिखाई देता है और न ही उनके मानसिक स्तर में.क्योंकि लगभग सभी शहरी सुविधाएँ वहां भी हैं. ग्रामीण इलाके के पशु-मवेशी भी हृष्ट-पुष्ट दिखाई देते हैं. वहां रहने वालों के व्यवसाय कुछ अलग होंगे, लेकिन रहन-सहन में कोई कमी नहीं दिखाई देगी.
दूसरी तरफ, हमारे यहाँ आर्थिक स्तर, सामाजिक स्तर और मानसिक स्तर, सभी में शहर और गाँव के बीच ज़मीन-आसमान का अंतर दिखेगा. यदि गाँव में सम्पन्नता दिखेगी भी तो केवल उन परिवारों में जिनका व्यवसाय या पढ़ाई को लेकर जुड़ाव किसी न किसी शहर से है.
क्या ही अच्छा हो, अगर कभी हमारे मन में अपने गांवों को भी विश्व-स्तरीय बनाने की चाह जागे.      

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