Sunday, February 19, 2012

"नो चोइस"अर्थात कोई विकल्प नहीं

दुनिया में आते समय यह हमारे हाथ में नहीं होता कि हम अपनी मनपसंद जाति या धर्म को चुन कर उसमें अपना जीवन शुरू करें. दुनिया में हमारी आँख खुलने से पहले ही यह सब तय हो चुका होता है.जिस घर में हम आते हैं, उसके तौर-तरीके, रीति-रिवाज़, जाति-संस्कार सब हम पर लागू हो जाते हैं. हमारा आधार हमें मिल जाता है.
लेकिन यह पहचान अंतिम नहीं है. हमारी हस्त-रेखाएं और कर्म-रेखाएं हमारे पास विकल्प के रूप में उपलब्ध होती हैं. हम एक कोशिश ज़रूर कर सकते हैं कि हम जिन लोगों के साथ चाहें, तन-मन से रह सकते हैं. तन से फिर भी दुनिया-समाज हमें किसी के साथ रहने, न रहने पर दखल देकर बाध्य करे, मन से तो हम जहाँ चाहें, जैसे चाहें, रह ही सकते हैं. अधिकांश लोग किसी भी जोखिम से बचने के लिए 'जैसा देश वैसा भेष' बना कर समय काट लेते हैं. लेकिन दुनिया में 'जैसी चाह वैसी राह'बनाने वाले भी हुए हैं.
अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार का नाम पद्मविभूषण पुरस्कार के लिए विचारार्थ सूची में था लेकिन इस बीच उन्हें कोई और सम्मान या पुरस्कार मिल जाने से उनकी दावेदारी ख़त्म हो गई. इसका अर्थ यह हुआ कि आप केवल किसी एक के  लाडले हों, सबके प्रिय नहीं हो सकते.सचिन तेंदुलकर भी पुरस्कार या शतक बनाने से चूक जाएँ, रिकार्ड बनाने से चूकने वाले नहीं हैं. बिना शतक हज़ार रन बनाने का करिश्मा तो वे दो बार कर ही चुके हैं, अब शायद बिना रन के  बॉल गवांने के भी चंद रिकार्ड उन्हीं के खाते में जाएँ.      

2 comments:

  1. आपसे सहमत हूँ। इस अनंत ब्रह्मांड में किसी भी व्यक्ति के जन्म और मृत्यु के दो बिन्दुओं के बीच का सब कुछ है ही कितना!

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  2. kitna ashchary janak hai yah satya ki anant aseemit brahmand men hame apne hisse ke pal hi 'sab kuchh' lagte hain.

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