Saturday, February 4, 2012

शब्दकोष में से ऐसे शब्द हटाये नहीं जा सकते?

कभी-कभी मुझे लगता है कि कुछ शब्द हमने जल्दबाजी में डिक्शनरी में डाल लिए. "स्वार्थी" शब्द पर गौर कीजिये. हमने पूरी तरह नकारात्मक अर्थ देकर इस शब्द को लोकप्रिय बना रखा है, पर क्या वास्तव में यह शब्द यही भाव लिए हुए है? 
स्वार्थी कोई हो ही नहीं सकता. आप जब घर में होते हैं तो आप चाहे जैसे कपड़े पहने हो सकते हैं.लेकिन घर में किसी दूसरे के आते ही आप अपने कपड़ों को लेकर सतर्क हो जाते हैं. कई बार तो उन्हें बदल डालते हैं. तो इसका मतलब यह हुआ कि आपने अच्छे कपड़े अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए पहने हैं. आप अकेले में चाहे जो कुछ खा लें, यदि कोई आपके साथ होगा तो आप अपने आप औपचारिक हो जायेंगे. यदि कोई कंजूसी करके पैसा जोड़ता है तो अधिकतर वह पैसा किसी और के काम आएगा. यदि कोई यह सोच कर जोड़ता है कि वह इस पैसे को अपने लिए ही भविष्य में काम में लेगा, तो वह व्यक्ति अपने परिजन को कष्ट न होने देने का भाव रखता है. इस प्रकार वह किसी और की जवाबदेही अपने पर ले रहा है, वह भला स्वार्थी कैसे हुआ. 
तो फिर स्वार्थी कौन और कैसे हुआ? यदि किसी व्यक्ति के द्वारा उसके अपने हित के लिए भी किये जा रहे काम को आप उसकी नकारात्मकता कह रहे हैं तो यह स्वार्थी की नकारात्मकता कहाँ हुई? यह तो आपकी नकारात्मकता हुई. ऐसे में 'स्वार्थी' नकारात्मक कहाँ हुआ. यह तो उस व्यक्ति की उसके अपने हक़ में की गई जागरूकता हुई. 
मान लीजिये, एक नेता वोट मांग रहा है. ये वोट वो अपने लिए मांग रहा है. यदि वह वास्तव में इस योग्य है कि उसे वोट दिया जाये तो फिर वह स्वार्थी नहीं हुआ. यदि वह वोट देने योग्य नहीं है फिर भी मांग रहा है तो वह इसीलिए तो मांग रहा है कि अन्यथा आप उसे वोट नहीं देंगे. तो वह स्वार्थी कहाँ हुआ? अब इसे इस तरह देखिये- यदि आपने उसे वोट दे दिया तो आप उसके समर्थक हैं, उसने वोट मांग कर क्या स्वार्थ साधा? और यदि आपने उसे वोट दिया ही नहीं तो उसने कौन सा स्वार्थ साधा?   

2 comments:

  1. यह अंतर बड़ा महीन है - विवेक से ही समझा जा सकता है।

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  2. :) बहुत कठिन है डगर पनघट की ...

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