Friday, February 17, 2012

न्यूयॉर्क और लन्दन के समकक्ष जाने के लिए मौलिकता ज़रूरी

भारत के मूर्तिकार अर्जुन प्रजापति ने बर्मिंघम में अपनी कला के लिए ज़बरदस्त सराहना और सम्मान पाया, इसके लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई. अब उन्होंने घोषणा की है कि वे अपनी कला के जीवंत प्रयोग से दिल्ली रोड पर न्यूयॉर्क और लन्दन की तर्ज़ पर मैडम तुसाद म्यूजियम जैसा ही एक म्यूजियम बनायेंगे.
उनके हौसले को पूरा समर्थन देते हुए भी उनकी सुझाव-पुस्तिका में कुछ बातें लिख देना ज़रूरी लगता है.
१. दुनियां में बड़ी सफलता हमेशा किसी मौलिक प्रयास को ही मिली है. भव्यता की नक़ल में तो केवल यही संतुष्टि छिपी है कि हमने भी वैसा कर दिखाया. इस प्रयास में हम किसी के बराबर आते हैं.
२. किसी भी बड़े काम के लिए हौसला ही पहली शर्त है, फिरभी दूसरी शर्त- संसाधनों को भी कम नहीं आँका जा सकता. वे कोई प्रायोजना शुरू करने से पहले आर्थिक पक्ष को भी सुनिश्चित करलें तो अधिक व्यावहारिक होगा.
३. प्रोजेक्ट में कुछ नवीनता लाने के लिए चयन के कुछ मौलिक मानदंड निर्धारित करें, ताकि दर्शकों में उत्सुकता  बने.
४. अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर उभरने के लिए कुछ अन्य देशों के समान विचारों वाले लोगों को भी जोड़ें.जिस से यह प्रयास किसी सामूहिक प्रयास की शक्ल ले सके.
ऐसे कामों में तो भारत के "काले-अरबपतियों" की मदद भी मिल जाये तो देश के नसीब से कुछ पाप ही धुलेंगे.     

1 comment:

  1. हमारे बचपन के मेलों में उडीसा से नन्दन कानन कला भवन नामक दल सजीव मूर्तियों की चल प्रदर्शनी करते थे। देश में मौलिक कलाकारों की कोई कमी नहीं है, समस्या शायद निवेशकों की नज़र/समझ में है।

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