Monday, June 4, 2012

उगते नहीं उजाले [ दस]

     लाजो ने  हठ  न छोड़ा। अगली सुबह उसकी आँखों में फिर से आशा की किरण चमक उठी। उसने सुन रखा था कि  'गीता' में भी यही कहा गया है -कर्म ही प्रधान है, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। लाजो ने मूषकराज से जो वरदान पाया था, वह कड़ी तपस्या के बाद मिला था। लाजो उसे ऐसे ही व्यर्थ न जाने देना चाहती थी।
     उसने सोचा, ऐसे निराश होकर बैठने से काम नहीं चलेगा। उसे आज फिर बाहर जाकर किसी न किसी की मदद करनी चाहिए, ताकि किसी की बिगड़ी छवि सुधर सके।
     आज लाजो लोमड़ी को ध्यान आया बरगद के पेड़ पर रहने वाली कोयल नूरजहाँ का। नूरी कितना मीठा गाती  थी। बरगद के पेड़ पर तो बस उसका घर था। वह तो सुबह होते ही चहकती-फुदकती आमों के बाग़ में  आ जाती, और आमों जैसे ही मीठे रसीले गीत सबको सुनाया करती। लोग कहते, भई  गला हो तो कोयल नूरी सा।
     पर वही लोग पीठ -पीछे कहते, ये नूरजहाँ कितनी काली- कलूटी और कुरूप है। उसकी छवि जंगल- भर में एक बदसूरत गायिका की थी।
     खुद लाजो ने पहले कई बार नूरी का मज़ाक उड़ाया था। पर अब लाजो खुद को बदलना चाहती थी। वह चाहती थी कि  वह किसी तरह नूरी की मदद करे ताकि उसकी छवि बदल जाए और लोग उसके रंग-रूप के बारे में छींटा -कशी न कर सकें।
     लाजो ने ठान लिया कि  वह आज नूरजहाँ के पास ही जायेगी। वैसे भी नूरी को उसने बड़े दिन से देखा न था। वह नहा-धोकर जल्दी से निकलने की तैयारी में जुट गई।
     लाजो को खूब मालूम था कि  शहरों में ब्यूटी-पार्लर होते हैं। वह जानती थी कि  इनमें तरह-तरह की कारस्तानियाँ होती हैं। काले व भद्दे होठों को रंग कर लाल कर दिया जाता है। बालों का रंग काला, पीला, भूरा या हरा कर दिया जाता है। तरह-तरह के क्रीम-पाउडर से चेहरे की रंगत निखारी जाती है।
     लाजो ने सोचा, यदि उसे किसी ब्यूटी-पार्लर में जाने का मौका मिल जाए तो वह तरह-तरह का सामान नूरी के लिए उठा लाये।
     पर ब्यूटी-पार्लर में बिना किसी काम के घुसना टेढ़ी-खीर था। बाहर चौकीदार लकड़बग्घे का पहरा रहता था। [जारी]

1 comment:

  1. अब तक की सभी कड़ियाँ पढी हैं, मज़ा आ रहा है, मगर मेरी टिप्पणियाँ अभी भी स्पैम में जा रही हैं।

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