Saturday, June 9, 2012

उगते नहीं उजाले [पंद्रह ]

     लाजो लोमड़ी को इस बात की ख़ुशी थी  कि  भैंस कृष्णकली को अब  कोई बुद्धू न कह सकेगा। जब लाजो लौटने लगी तो कृष्णकली ने उससे कहा- बहन, मैंने तो सुना है कि  विद्यालय में बच्चों को पढ़ाते समय उनसे प्रार्थना भी करवाई जाती है। तुमने तो मुझसे कोई प्रार्थना करवाई ही नहीं।
     अरे हाँ, वह तो मैं भूल ही गई। लाजो चहकी।
     तभी लाजो व कृष्णकली  एक साथ चौंक पड़ीं। कृष्णकली के खूंटे से कोई आवाज़ आ रही थी। दोनों ने एक-साथ उधर देखा, जैसे खूंटा गा रहा हो-

"हम सब पढ़-लिख जाएँ जग में, जन-जन का होवे सम्मान
जिसने  हमको  ज्ञान  दिया है, बोलो  क्या  है  उसका  नाम?"

     कृष्णकली आश्चर्य से खूंटे की ओर  देख ही रही थी कि  लाजो ऊंचे स्वर में गा उठी-

"ज्ञान-दीप की बाती बनकर, जो आती है सबके धाम
सारे  उसको  लाजो कहते,  लाजवंती  उसका   नाम !"

     लाजो का गीत सुनकर कृष्णकली बड़ी खुश हुई। वह ख़ुशी से अपनी पूंछ हिलाने लगी। तभी खूंटे से उड़ कर दिलावर झींगुर कृष्णकली की पूंछ पर बैठ गया।
     दिलावर को देखते ही लाजो के होश उड़ गए। लाजो को अपनी भूल का अहसास हो गया। पर अब हो ही क्या सकता था? वह कृष्णकली को अलविदा कहे बिना ही गर्दन झुका कर अपने डेरे की ओर  लौट पड़ी।
     दिलावर उसकी पीठ पर बैठ कर उसके साथ ही घर वापस आया। लाजो ने उस रात खाना तक न खाया। रात गहरी हो चली थी। [जारी] 

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