Monday, June 11, 2012

उगते नहीं उजाले [ सत्रह ]

     लाजो लोमड़ी जानती थी कि  समझाने-बुझाने से तो गिरगिट बाबू मानने वाले हैं नहीं। उनसे  यह कहने का कोई लाभ नहीं था कि वह रंग न बदला करें।
     लाजो को एक ही रास्ता नज़र आया, कि  वह बाज़ार से पक्के रंग का कोई डिब्बा ले आये, और गिरगिट  छन्नू-मियां को रंग दे !फिर बार-बार रंग बदलने का झंझट ही ख़त्म।
     पर अब दो उलझनें थीं। एक तो यह , कि  लाजो रंग के लिए पैसे का बंदोबस्त कैसे करे, और दूसरी, रंग लगाया कैसे जाए। क्योंकि गिरगिट मियां इतने सीधे तो थे नहीं कि  चुपचाप  अपना शरीर रंगवा डालें। जोर जबरदस्ती लाजो करना नहीं चाहती थी। सेवा-पुण्य का  काम ठहरा। किसी को सुधारने का यह कौन सा तरीका था, कि  उससे जबरदस्ती ही की जाए। लाजो तो सबको खुश रखना चाहती थी।
     कुछ भी हो, लाजो नसीब की बड़ी धनी थी। आज होली का त्यौहार निकला। लो, सुबह से उसका ध्यान ही नहीं गया। दूर से ढोल-नगाड़ों की  आवाजें आ रही थीं। दोपहर में जंगल-भर में रंगारंग होली शुरू होने वाली थी।
     हो गया काम ! अब भला लाजो को क्या परेशानी। गिरगिट मियां को रंग डालने का अच्छा बहाना मिल गया। लाजो ने सोचा, हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा आएगा।
     उधर जैकी-जेब्रा का बेटा एशियन पेंट्स की फैक्ट्री में माल ढोने  के लिए लगा हुआ था, वही रंग का एक डिब्बा लाजो बुआ को उपहार में दे गया।
     लाजो चल दी छन्नू-गिरगिट से होली खेलने। वह सोचती जा रही थी, आज गिरगिट पर ऐसा पक्का रंग चढ़ायेगी कि  मियां तरह-तरह के रंग बदलना ही भूल जायेंगे। फिर कोई नहीं कह सकेगा कि   "क्या गिरगिट की तरह रंग बदलते हो?" सुधर जाएगी छवि गिरगिट की।
     त्यौहार होने का यह लाभ हो गया लाजो को, कि  नाश्ता-पानी घर में नहीं बनाना पड़ा कुछ। अब आज तो जहाँ जाये, पकवान मिलने ही वाले थे। छन्नू कोरा होली खेलकर थोड़े ही छोड़ देता  लाजो भौजी को? खातिरदारी तो करनी ही थी। लाजो होली खेली, और खूब जमके खेली।
     सर से  लेकर पूंछ तक लाल ही लाल कर छोड़ा गिरगिट बाबू को। गिरगिट जी तो बेचारे यह भी नहीं जान पाए कि  अब कितना भी रगड़-रगड़ कर नहायें, यह रंग नहीं छूटने वाला। [ जारी ]

2 comments:

  1. बेचारी लाजो लोमड़ी, उसकी महानता को उसके महान मन के अलावा कोई नहीं पहचानता! सो सैड ...

    ReplyDelete
  2. ye uski badi uplabdhi hai ki usne aapko hamdard bana liya. itni badi uplabdhi se to vah 'panchtantra' ke saare kasht bhool sakti hai. dhanywad!

    ReplyDelete

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...