Saturday, June 9, 2012

उगते नहीं उजाले [ चौदह]

     बख्तावर खरगोश ने कभी लाजो लोमड़ी को बताया था कि  आजकल के बच्चे कॉपी- किताब से पढ़ाई नहीं करते। उन्हें सब-कुछ टीवी-कंप्यूटर से सिखाया जाता है। इससे बैठे-बैठे मनोरंजन भी होता रहता है, और आसानी से पढ़ाई भी। हाँ, बस एक खतरा रहता है कि  आँखों पर बचपन में ही चश्मा लग जाता है।
     लाजो ने सोचा कृष्णकली को पढ़ाने का यही तरीका सबसे अच्छा रहेगा। चश्मा लगे तो लगे। कृष्णकली को चश्मा लगाने में कहाँ दिक्कत थी। लम्बे-लम्बे घुमावदार सींग थे, एक क्या दस चश्मे लग जाएँ।
     लाजो ने बैठे-बैठे ही सपना देखना शुरू किया- "वह कृष्णकली को पढ़ाने गई है। वह एक प्यारा सा टीवी और नन्हा सा कंप्यूटर लेकर कृष्णकली के सामने बैठी है। कृष्णकली भैंस एक अच्छी बच्ची की तरह सब कुछ याद कर-कर के सुना रही है। फिर वापस आते समय कृष्णकली ने ढेर सारे दूध की मलाईदार खीर लाजो को दी है। लाजो ने भरपेट  खाई है, और जो बची उसे एक बर्तन में साथ लेकर वापस आ रही है।"
     तभी लाजो जैसे नींद से जागी। उसका सपना टूट गया। उसने देखा, कि  उसके मुंह से पानी टपक-टपक कर  ज़मीन को भिगो रहा है। लाजो शरमा गई। उसने जल्दी से इधर -उधर देखा कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा। फिर पैर से फ़टाफ़ट ज़मीन साफ करने लगी।
     लाजो का भाग्य  आज बड़ा प्रबल था। वह बैठी सोच ही रही थी कि  गली में एक टीवी बेचने वाला आया। उसके कंधे पर एक झोला टंगा था जिसमें छोटे-छोटे कंप्यूटर भी थे।
     बेचने वाला बड़ा भला था। वह बोला, यदि लाजो किसी की जमानत दिला सके तो वह सौदा उधार भी कर सकता है। ऐसे में लाजो का पड़ौसी  बख्तावर खूब काम आया। सब झटपट हो गया।
     भैंस कृष्णकली के तो ख़ुशी के मारे पाँव ही ज़मीन पर न पड़ते थे। जब उसे पता लगा कि  लाजो लोमड़ी उसे पढ़ा-लिखा कर बुद्धिमती बनाना चाहती है तो उसने हुलस कर  लाजो को गले से लगा लिया।
     उसे पढ़ाकर लाजो लौटने लगी तो कृष्णकली ने उसे बताया कि  वह एक बच्चे को जन्म देने वाली है, इसलिए वह आजकल दूध नहीं दे रही। उसने लाजो को बिना दूध की चाय पिलाई। खूब कड़क। [जारी] 

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