Wednesday, June 13, 2012

उगते नहीं उजाले [उन्नीस ]

     लाजो ने हठ  न छोड़ा।
     आज लाजो लोमड़ी ने मन ही मन निश्चय किया कि  वह तालाब के किनारे जाकर बगुला भगत से मिलेगी। उसने सुन रखा था कि  सारे जंगलवासी बगुला भगत को पाखंडी कह कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं, क्योंकि वह एक टांग  से पानी में खड़ा होकर दिनभर  मछलियाँ खाता है।
     उसने सोचा, वह बगुला भगत से मिलकर उसे समझाएगी कि  वह मछलियों को न खाया करे। जिस तालाब में वह रहता है उसी की मछलियों को खाना भला कहाँ का न्याय  है।
     भगत मछली खाना छोड़ देगा तो फिर जंगल में उसे कोई भी बुरा न कहेगा। इससे बगुला भगत की छवि अच्छी हो जाएगी, और फिर मूषकराज  के वरदान के अनुसार लाजो की अपनी छवि भी सुधर जायेगी। सब लाजो की तारीफ़  करेंगे और उसका जीवन सफल हो जायेगा।
     लाजो यह भी जानती थी कि  दूसरों की भलाई करने के बाद अपनी तारीफ़ में गाना गाने से उसका काम कई बार बिगड़ गया था। उसने मन ही मन ठान लिया कि  आज चाहे कुछ भी हो जाए, वह लौटते समय गाना नहीं गाएगी। इस तरह उसकी तपस्या पूरी होगी और उसकी तपस्या का फल मिल जाएगा।
     सुबह तड़के  ही लाजो बड़े तालाब की ओर  चल दी। उसे ज्यादा पूछताछ नहीं करनी पड़ी। बगुला भगत उसे किनारे पर ही खड़ा मिल गया। वह चुपचाप खड़ा  होकर ध्यान  लगा रहा था, ताकि उसे संत -महात्मा समझ कर मछलियाँ उसके पास आ जाएँ, और फिर वह तपाक से झपट्टा मार कर उन्हें खा डाले।
     लाजो सही समय पर पहुँच गई। उसे देखते ही भगत प्रणाम करता हुआ किनारे चला आया। हाथ जोड़ कर बोला- कहो मौसी, आज इधर कैसे आना हुआ? बगुला भगत को थोड़ी शंका भी हुई, क्योंकि उसने पंचतंत्र के दिनों में लोमड़ी द्वारा अपने चचेरे भाई लल्लू सारस को खीर की दावत के बहाने बुलाने और धोखा देने की कहानी "जैसे को तैसा" भी सुन रखी थी।
     लाजो ने झटपट उसे अपने आने का कारण  बता डाला। बोली- तुम आज से मछलियाँ खाना छोड़ दो, तो तुम्हारी बहुत प्रशंसा होगी। मुझ पर भी उपकार होगा।
     भगत हैरान रह गया। फिर भी बोला- अरे मौसी, इतनी सी बात? [जारी]

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