Wednesday, November 30, 2011

किसी देश की सामाजिक बैलेंस-शीट में समझदारी "एसेट" है या 'इनोसेंस' को एसेट कहा जाय?

एक दिन दूधवाले को कोई काम होने से वह दूध देने न आ सका. उसने अपने ग्यारह साल के बेटे को दूध देने भेज दिया. मैंने केवल बच्चे से कुछ बात करने के शिष्टाचार और परिहास के नाते उस से पूछ लिया- आज दूध में कितना पानी मिला कर लाया? लड़का स्वाभाविक रूप से बोल पड़ा- आधा दूध और आधा पानी. सब हँस पड़े. अगले दिन मैंने यह बात अपने दूधवाले को सुनाई, तो वह झेंपते हुए बोला- जी, वह तो बच्चा है, उसे कुछ मालूम नहीं रहता.
एक दिन एक बस में जाते हुए एक महिला ने जब अपने बच्चे के लिए आधा टिकट माँगा, तो कंडक्टर ने उस से बच्चे की उम्र पूछी. महिला को पता था कि आठ साल के बच्चे का पूरा टिकट लगने लगता है, इसलिए वह बोली- साढ़े सात साल. बच्चा तपाक से बोल पड़ा- क्या मम्मी, आपभी,आपने  केवल नौ रुपये के लिए मेरी उम्र एक साल घटादी. सब हँस पड़े.
एक कवि ने कहा है- "चाँद सितारे  छू लेने दो,  नन्हे-नन्हे  हाथों  को
                                चार किताबें पढ़ कर ये भी, हम जैसे हो जायेंगे"
२०११ की जनगणना के नतीजे आ गए हैं. बच्चों की संख्या लगभग २० से २५ प्रतिशत के बीच है.
क्या माना जाय? मानव संसाधन, जिसमें हम दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं, वह भी हमारे पास एक-चौथाई ही शुद्ध है?
                                 बच्चो जब तक भी रह पाओ,बच्चे, तब तक बने रहो
                                 तुम भी बड़े हुए तो इस दुनिया को कौन सम्हालेगा ?

2 comments:

  1. एक बुद्धिमान सहकर्मी का कथन याद आया कि शराफ़त में किसी को बुद्धू न कहना हो तो उसे भोला कह देते हैं। बचपन का भोलापन और ईमानदारी आगे कैसे सम्भाली जाये, यह सचमुच एक बड़ी समस्या है। भविष्य उज्ज्वल भले न हो भोला भी नहीं है। दुखद है कि हम इस एक चौथाई शुद्धता को आज़ादी के 6 दशक बाद भी पूरी तरह शिक्षा नहीं दे सकते।

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  2. aapka vichar bilkul sahi hai, par shikshit hone se pahle ye bachche hamare badon se zyada samajhdari dikha rahe hain.

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