Saturday, November 12, 2011

हम कौन सी तारीख को अच्छा और कौन से साल को बुरा कह दें?

सात अरब लोग जिस दुनिया में रह रहे हों, उसका कौन सा क्षण भला और कौन सा बुरा? क्या कोई ऐसी घड़ी है, जिस समय इन सभी का हित हो रहा हो? क्या कोई ऐसा काल है जब सब केवल दुखी या त्रस्त हों? कभी कोई ऐसा दिन आया जब सबकी मनोकामना पूरी हुई?
क्या धरती का कोई कोना ऐसा है जहाँ केवल सुख बसते हों? क्या कोई ऐसा देश है जिसने विपदा नहीं झेली?
तब कलेंडर हमें इतना उतावला क्यों बना देते हैं.
हाँ, एक दिलचस्प खेल, एक मज़ेदार संयोग के रूप में हम इस संयोग का स्वागत करें.
मेरी तो बात ही अधूरी रह गई इस दिन. न जाने क्या हुआ, न फोन चला न इंटरनेट. मैं इसीलिए कह रहा था कि आती-जाती रौनकें वक्त की पाबंद हैं, वक्त ही फूलों की सेज है और वक्त ही काटों का ताज.आदमी को चाहिए, वक्त से डरकर रहे.
ये फलसफा जो मैं आपको बता रहा हूँ, यह हमें बहुत सारे ऐसे लोगों की याद दिलाता है, जो अब हमारे बीच नहीं हैं.राज कुमार, सुनील दत्त, बलराज साहनी...
लेकिन इनके न होने से दुनिया रुकी नहीं है, अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ खान, आमिर खान, सलमान खान, ऋतिक रोशन, अक्षय कुमार, सैफ अली, शाहिद कपूर, अजय देवगन, रणबीर कपूर हैं न.   

1 comment:

  1. मैं भी सहमत हूँ, शास्त्र भी सहमत हैं:
    तदैव लग्नम सुदिनम तदैव ताराबलम चन्द्रबलम तदैव
    विद्याबलमदैवबलम तदैव, लक्ष्मीपतिमतेन्द्रियुग्मस्मरामि॥

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