Tuesday, November 1, 2011

किफायती अम्बानी जी और फ़िज़ूलखर्च राजू

राजू मेरा बहुत पुराना परिचित है. बल्कि कुछ साल पहले तो उसने मेरे पास काम भी किया था. वह मेरे बन रहे मकान का कुछ दिन केयर-टेकर रहा था. लेकिन मेरे पास उसे पैसा बहुत कम मिलता था. वह कहता था कि इस से तो उसका जेब-खर्च भी नहीं चलता. इसीलिए उसने काम छोड़ दिया. शायद उसने कोई दूसरी नौकरी पकड़ ली. 
एक दिन मिल गया. उसके हाथ में अखबार में लिपटा एक पैकेट था.मेरे पूछने पर बताने लगा- अभी-अभी बाज़ार से एक बनियान खरीदी है. 
क्यों, तूतो कहता था, कि बनियान खरीदना फ़िज़ूल-खर्ची है, गर्मी में खाली शर्ट से काम चल जाता है.मैंने कहा. 
वह सकुचाता हुआ बोला- ऐसे ही बाज़ार से गुज़र रहा था, सामने टंगी दिखी तो खरीद ली.वह अखबार का पैकेट खोल कर दिखाने लगा. 
मैंने आदतन अखबार ले लिया और चलते-चलते सरसरी तौर से पढ़ने लगा. वह बात करता साथ चल रहा था. 
अखबार में मुंबई में मुकेश अम्बानी के उस बहु-मंजिला गगन-चुम्बी मकान का फोटो था, जिसे दुनिया की  सबसे कीमती रिहायशी बिल्डिंग बताया जा रहा था. खबर थी कि कई अरब की इस इमारत में किसी वास्तुविद ने कुछ खामी बता दी थी, जिसके कारण इसमें फिर से रद्दोबदल की जा रही थी.
मुझे मकान मालिक से थोड़ी हमदर्दी हुई. "घर" तो इंसान की मूल-भूत ज़रुरत है. इसे तो बनाया ही जाना चाहिए. साथ ही मुझे यह देख कर और भी अच्छा लगा कि अम्बानी जी वास्तुविद के कहने से इसे ठीक करवा रहे हैं. क्योंकि वास्तु शास्त्र के हिसाब से नहीं बना मकान नुक्सान दे सकता है. इसे दुरुस्त करवा लेना नुक्सान से बचने की, यानि किफ़ायत से चलने की निशानी है. 
मैंने झट से अखबार राजू को लौटा दिया, कि कहीं वह मुझे मांग कर अखबार पढ़ने वाला कंजूस न समझे.    

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