Monday, November 14, 2011

फूल बनें अंगारे बनाम कहावतों का युग-बोध

बाल दिवस तो दुनिया भर के बच्चों का त्यौहार है, बच्चों ने इसे उमंग और उल्लास से मनाया भी, मगर 'बड़ों' के चेहरे इस दिन भी कुम्हलाये रहे, क्योंकि यह उन जवाहर लाल नेहरु का जन्म दिन था, जो कभी भारत के प्रधान मंत्री थे. अब तो वे केवल देश के पड़नाना हैं. दफ्तरों में टांगने के लिए तो हर पार्टी के पास अपने-अपने पूर्वजों की तस्वीरें हैं. हमारी इसी बटी-बिखरी भावना ने बालदिवस की गरिमा को भी  खंडित कर दिया है. कल यही बात कहनी चाही थी मैंने.
आज फूलपुर से यूपी के चुनावों का बिगुल बजता भी सुनाई दिया. गनीमत यह है कि बच्चे 'वोटर" नहीं हैं, वर्ना उन्हें बालदिवस का यह तोहफा ज़रूर नागवार गुज़रता. बच्चों को कुछ नापसंद हो तो फूलों को अंगारे बनते भी देर नहीं लगती. अंगारे सिर्फ दीपावली पर ही अच्छे लगते हैं, बाकी दिनों में तो ये बड़ी खतरनाक चीज़ है, हाथ से  छू भी जाएँ तो हाथ जल जाता है.खैर, हाथ और फूल का ये खेल तो पुराना है.
कहते हैं कि समय के साथ साथ सब बदल जाता है, भाषा भी, व्याकरण भी और कहावतें भी. जो लोग तेल की बढ़ती कीमतों से खुश होकर सोच रहे थे कि अब न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी, वे ये देख कर हैरान हैं कि तेल अब 'मन' में नहीं 'लीटर' में बिक रहा है और राधा की दिलचस्पी नाचने में नहीं, नचाने में है.  

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