Monday, November 28, 2011

अच्छा, तो ये था महंगाई पर लम्बी और रहस्यमयी चुप्पी का राज?

जिस तरह रेल की पटरी में सामानांतर  चलती दो धाराएँ होती हैं, ठीक उसी तरह भारतीय संसद में भी दो धाराएँ, एक सत्ता-पक्ष और दूसरा विपक्ष, होती हैं.
रेल की पटरी पर रेल दौड़ जाती है, संसद थमी हुई है. रुकावट के लिए खेद किसी को नहीं है.
विपक्ष को तो खेद क्यों होगा, उसी ने तो रेल रोकी हुई है. सत्ता-पक्ष को खेद इसलिए नहीं है, क्योंकि उसके पास जाने को कोई गंतव्य नहीं है. टाइम पास करना है, संसद चला कर करें या संसद रुकवा कर, कोई फर्क नहीं पड़ता.
आम आदमी को फ़िलहाल यह पता नहीं चल पा रहा कि एफ डी आई से  उसे क्या नुकसान होगा और अभी उसे क्या फायदा हो रहा है.
कुछ दिन पहले हम जोर-शोर से "ग्लोबल" हो रहे थे. दुनिया हमें जेब में आती नज़र आने लगी थी. विदेशी वस्तुओं की गुणवत्ता और किस्में हमें लुभाने लगी थी. अपने शहरों को हम विश्व-स्तरीय बनाने का सपना देखने लगे थे. बाज़ार बनना और बाज़ार बनाना हमें रास आने लगा था. महाशक्ति बनने की उम्मीदें हमारा सर गर्व से ऊंचा करने लगी थीं.
फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि हम अपने पुराने दिनों को याद करके अपनी चाल वापस लेने लगे?
क्या हम ग्लोबल होने से डर गए? क्या हमारे छोटे व्यापारी की गद्दी हिल गई? गुणवत्ता, स्पर्धा और विकास की हमारी महत्वाकांक्षा कहाँ गई?
शायद हमें अपनी सरकार की नीयत पर संदेह हो गया? शायद हम समझ गए कि सरकार बेतहाशा महंगाई बढ़ा कर, और उस पर कोई कार्यवाही न करके हमसे क्या चाह रही थी?
क्या हमने सरकार का सारा प्लान चौपट  कर दिया?क्या हम ज़रा जल्दी जाग गए?सरकार दबे पाँव रात में हमारे घर में कूदी ही थी कि हमने बत्ती जला दी.सरकार का सारा खेल बिगड़ गया.      

1 comment:

  1. छोटे व्यापारी की गद्दी सारी दुनिया में हिल रही है। अफ़सोस यह है कि छोटे ग्राहक की हालत भी कोई खास अच्छी नहीं है। हाँ दबे पाँव कूदने वाली सरकार की आँख में रोशनी तो डालनी ही पड़ेगी।

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