Friday, July 25, 2014

हिंदी का मुद्दा केवल भाषा का सवाल नहीं है !

हिंदी के पक्ष में भारत में बहुत बातें कही जा सकती हैं-
-ये संविधान की घोषित राजभाषा है, इसमें कार्य करना एक राष्ट्रीय विचार है।
-भारतीय स्वाधीनता संग्राम हिंदी के सहारे ही लड़ा गया।  गांधी,सुभाष,राजगोपालाचार्य और पुरुषोत्तमदास टण्डन सभी भारत को एक करने के लिए इसे ज़रूरी मानते थे।
-यह देश के सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है और लोकतंत्र में संख्या का महत्व किसी से छिपा नहीं है।
किन्तु हिंदी के संग सीमाएँ भी कम नहीं जुड़ी हैं-
-दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के लोग हिंदी की मुख्यधारा से अपने को जुड़ा हुआ नहीं पाते।
-मेधावी और विलक्षण लोगों को हिंदी केवल 'देश' तक ही सीमित कर देती है।  वे विश्व से नहीं जुड़ सकते।
-अपरिमित तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान के रास्ते केवल हिंदी के सहारे नहीं खुल सकते।
इसके अलावा एक व्यावहारिक खतरा और भी है। भारत में अशिक्षित,अल्पशिक्षित और दोषपूर्ण शिक्षित       [ ऐसे लोग जिन्होंने डिग्रियां तो येन-केन-प्रकारेण ले लीं,पर वांछित ज्ञान नहीं लिया] लोगों की भी भरमार है।किन्तु ऐसे लोग हिंदी में अपने को दक्ष मानते हैं, वे डाक्टरों, वकीलों,वैज्ञानिकों आदि के कार्य में अनुचित हस्तक्षेप करते हैं, जिससे "नीम हकीम" वाली स्थिति पैदा होती है।
अतः हिंदी का सवाल अपनी गति से समय ही हल करेगा।            

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