Tuesday, July 22, 2014

विद्या ददाति विनयम्

अबकी बार बूढ़ा धोबी जब उनके कपड़े प्रेस करके लाया, तो उसके साथ एक किशोर लड़का भी था। बूढ़ा बोला-"अबसे आपके पास ये आया करेगा, ये आपके कपड़े भी ले आएगा, और आप इसे थोड़ी देर पढ़ा देंगे तो आपका अहसान होगा, आपकी फ़ीस तो मैं दूँगा ही।"
उनकी फ़ीस सुन कर धोबी को एकबार तो लगा, जैसे गर्म प्रेस से हाथ छू गया हो, पर इसका तो वह अभ्यस्त था ही, बात तय हो गयी।  
कुछ दिन बाद बुज़ुर्ग और पारखी धोबी को महसूस हुआ कि उनके कपड़ों की क्रीज़ जितनी नुकीली बनती है, उतना उसके लड़के का दिमाग़ पैना नहीं हो रहा, और लड़का अब धोबी का काम करने में भी शर्म महसूस करने लगा है। उसे उनकी फीस ज़्यादा और कपड़ों का मेहनताना कम लगने लगा। उसने लड़के को समझाया कि उनसे प्रेस की दर कुछ बढ़ाने की अनुनय करे।  
लड़के ने संकोच के साथ अपने पिता की बात अपने शिक्षक को बताई। शिक्षक बोले- "नए साल से पैसे बढ़ा देंगे।"
पिता-पुत्र संतुष्ट हो गए। 
जनवरी में लड़के ने दर कुछ बढ़ाने के लिए कहा। वे बोले-"अरे ये तो अंग्रेज़ों का नया साल है, हमारा थोड़े ही।"लड़का चुप रह गया।  
अप्रैल में लड़के ने झिझकते हुए उन्हें फिर याद दिलाया।  वे तपाक से बोले-"अरे ये तो व्यापारियों का नया साल है, हमारा थोड़े ही।"लड़का मन मार कर चुप रहा।  
जुलाई में लड़के के स्कूल में नया सत्र शुरू होने पर उसने कहा- "सर, अब तो शिक्षा का नया साल है, आप मेरे पैसे कुछ बढ़ाएंगे?"
वे बोले-"अरे रूपये-पैसे की बात दिवाली से करते हैं।" लड़का सहम कर चुप हो गया।
कुछ दिन बाद वे परिहास में लड़के से बोले-"आज गुरु पूर्णिमा है, हर विद्यार्थी आज अपने गुरु को कुछ उपहार देता है, तुम मुझे क्या दोगे ?"
लड़के ने कहा-[जारी ]        
          

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