Saturday, July 12, 2014

चलो उन्हीं से पूछते हैं !

पेड़ की डाल पर बैठे एक कबूतर ने देखा कि सामने वाले मकान में एक खूबसूरत खिड़की है,जिस पर कोई पर्दा भी नहीं है और सफ़ाई होने के कारण आसपास कोई कीट-पतंगा भी मँडरा नहीं रहा।
उसकी आँखों में उमंग की तरंगें आने लगीं। उसने मन ही मन ठान लिया कि कुछ दिनों से उसका जिस कबूतरी से प्रेम चल रहा है, यदि वह गर्भवती हुई तो हम अपना घरौंदा इसी खिड़की में रखेंगे।
कहते हैं न, शिद्दत से कुछ चाहो तो क़ायनात उसे देने में देर नहीँ करती। कबूतरी की आँखों में एक दिन नव-निर्माण की लालसा दिपदिपाने लगी।
दोनों मिल कर बाग से तिनके ला-लाकर खिड़की पर रखने लगे।
पर ये क्या? इधर बेचारे दोनों पंछी तिनके लाते, उधर भीतर से एक लड़की बार-बार उन्हें बुहार कर नीचे फ़ेंक देती। यह सिलसिला सुबह से दोपहर तक चलता रहा, न पखेरू ही थके और न लड़की ही आज़िज़ आई।
लड़की ने सोचा कबूतर अब तक क्यों नहीं थके?
-जब तक काम पूरा न हो, उसे कैसे छोड़ दें।
-उन्हें याद ही नहीं रहता था कि उनके पहले लाये गए तिनके फेंक दिए गये हैं।
-कबूतर सोचते, हम दो हैं, ये अकेली, देखें कब तक रोकेगी?
-हमें हटाती तो हम एक मिनट में उड़ जाते, पर अपने बच्चों का आशियाना हम आसानी से उजड़ने नहीं देंगे।
आख़िर थक कर लड़की ने कबूतरों से ही पूछा-"क्यों रे उत्पातियो,इस ज़िद की वजह?"
"दुनिया ऐसे ही बनी है मेमसाहब!" कबूतरों ने कहा।
                   

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