Monday, June 2, 2014

यह संभव नहीं है, व्यावहारिक भी नहीं, लेकिन एक दिन होगा, करना पड़ेगा

कम से कम भारत में तो "चिकित्सा-सुविधा" को व्यापार के दायरे से हटाना ही होगा।  यदि एक डॉक्टर मरीज़ को सामने देख कर पहले  इस बात पर विचार करे कि "मैंने डॉक्टर बनने के लिए क्या खर्च किया है" या कि मरीज़ की जेब का वज़न कितना है, या फिर बीमा कम्पनी इसे क्या-क्या सुविधा दे रही है, डॉक्टर की छवि, मरीज़ की सेहत और समाज के ढाँचे के लिए अच्छा नहीं है।
यहाँ कुछ बिज़नस-माइंडेड डॉक्टर तर्क देते हैं कि यदि मरीज़ की जेब पर बोझ नहीं पड़े, और बीमा-कंपनी हमें पैसा दे दे, तो क्या नुक़सान है।
नुक़सान ये है, कि बीमा-कंपनी भी व्यापारिक कम्पनी है, यदि वह किसी को अवांछित देगी, तो वह समाज से "अवांछित" समेटेगी भी। कुछ युवा और उत्साही डॉक्टर, कुछ वरिष्ठ भी, यहाँ तर्क देते हैं, कि कम्पनी तो फिर भी समेटेगी, चाहे हम कम लें,या ज्यादा। नहीं, सच यही है कि यदि कम्पनी पर आपको अवांछित देने का दबाव बनेगा, तो वह अपनी नैतिक ज़िम्मेदारियों की अनदेखी भी ज्यादा करेगी।
अब हम जहाँ पहुँच गए हैं, वहां चिकित्सा-व्यवस्था के सरकारी अधिग्रहण की नहीं, तो कम से कम निजी क्षेत्र पर प्रभावी अंकुश की जरुरत तो है ही।
सच तो ये है कि जिस समाज से नैतिक मूल्य झर जाते हैं, वहां कठिनाइयाँ बढ़ तो जाती ही हैं।              

2 comments:

  1. बिल्कुल सही, सौ प्रतिशत सही .

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