Monday, June 9, 2014

मक़बूल फ़िदा हुसैन साहब की पुण्यतिथि पर

पढ़िए दो कवितायेँ -हुसैन साहब की


रेम्ब्रां के चित्रों की दरारें                                
                                                                 
                                                                 
मुझे पता है                                          
रेम्ब्रां के चित्रों की दरारें
जिनके भूरे रंग मुझमें
जल उठते हैं।
मैं कांपता नहीं
हालाँकि पथरीली राहों से
गुज़रे हुए मेरे जूते
ज़मीन में गहरे धंसे हुए हैं
लेकिन टर्नर के चित्र के पानी में
बहता रेशमी सूरज
मेरे कानों में तीखी गूँज भर देता है।

जीन व जीना बुकशेल्फ 

.... मैं
रेम्ब्रां की तस्वीरों के रख़नों से
खूब वाकिफ हूँ
जिनके भूरे रंग
मेरे अंदर जलते हैं
मैं नहीं लरजता
अगरचे
गर्दआलूदा जूते
ज़मीन में धंसे हुए हैं
लेकिन
नदी में बहता हुआ रेशमी सूरज
मुझे लरज कर अन्दाम कर देता है।

कैसी लगीं? हिट हैं?     

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