Sunday, June 15, 2014

बधाई

ये उन दिनों की बात है जब न तो पुल हुआ करते थे, और न ही नावें।  कहीं भी पानी होने का मतलब था दुनिया की दीवार।  जो इधर है,  इधर रहेगा और जो उधर है, वह उस पार ही रहेगा।
जो बरसाती नदी-नाले हुआ करते थे, वे भी बस्तियों को बाँट दिया करते थे, और जब बरसात का मौसम बीतने पर वहां पानी उतरता, तो ज़मीन दिखती और आवागमन शुरू होता।
लोग उन दिनों पानी से बहुत त्रस्त रहते थे, और चाहते थे कि पानी बीत जाए, रीत जाए।
लोग पानी को मारा करते थे।  कोई पानी की सतह पर पत्थर फेंकता, तो कोई डंडे से उसे पीटता।  कोई गन्दा हो जाता, तो सब उस पर पानी फेंकते। वह खुद भी अपनी गंदगी उतार-उतार कर पानी में फेंका करता।
आखिर एक दिन परेशान होकर पानी ने एक आपात बैठक की।  जगह-जगह का पानी इकट्ठा हुआ।  पानी ने कुछ अहम फैसले लिए, ताकि उसकी वक़त बनी रहे।
पानी ने तय किया कि वह अब केवल दरिया-समन्दरों, तालाब-पोखरों, गड्ढों-नालों में ही नहीं रहेगा, बल्कि इंसान के साथ कंधे से कन्धा मिला कर उसके अपने बीच भी रहेगा।
वह इंसान की आँखों में रहेगा, उसके खून में रहेगा, उसकी दाल-रोटी में रहेगा,उसके घर में रहेगा।
उधर इंसान ने पानी के रुख में बदलाव देखा तो उसने भी सोचा कि वह अब पानी के साथ प्रेम से रहेगा। पानी जहाँ बहना चाहेगा, इंसान उसके उतरने की बददुआ नहीं करेगा, बल्कि उसकी मौज़ों की रवानी का सम्मान करके उसे बहता रहने देगा, और उस पर पुल बना लेगा, या फिर उस पर खूबसूरत बज़रे तैरा देगा,कश्तियाँ उतार देगा, मस्तूलों वाले जहाज बहा देगा। इतना ही नहीं,उसने सोचा कि वह बरखा का स्वागत गाकर किया करेगा।
कहते हैं कि मिट्टी पानी के बीच ऐसा प्यार पनपा कि धरती गर्भवती हो गई, और उसके गर्भ में एक दिन एक ऐसा जलाशय जन्मा, जिसमें दुनिया के सारे सागरों से तीन गुना पानी है।

                    

2 comments:

  1. पर इंसान की आँखों का पानी तो खत्म हो चूका है यह हमें नहीं भूलना चाहिए

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  2. Aapki baat 100 pratishat sahi hai, isiliye dharti ne abhi "jalashay"ka kewal ashwasan hi diya hai, pani diya nahi hai.Dhanyawad!

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