प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
Saturday, July 16, 2011
उन सत्तर महिलाओं का क्या होगा?
क्षमा कीजिये, आलेख का शीर्षक ही गलत हो गया. कृपया इसे यों पढ़ें- उन सत्तर पुरुषों का क्या होगा? यदि किसी एक व्यक्ति पर भी संकट आता है तो लोग सरकार को विफल बताने लगते हैं, और स्तीफा मांगने लग जाते हैं. अब एक- दो नहीं, पूरे सत्तर व्यक्तियों पर संकट आया है. कौन उन्हें खाना देगा? कौन उनके लिए करवा-चौथ का व्रत रखेगा? कौन उनके लिए मंगल-सूत्र पहनेगा? ये सत्तर लोग किसी विमान अपहरण में नहीं फंसे, अपने-अपने घर आराम से बैठे हैं. पर आखिर कब तक बैठेंगे? माँ, बाप, भाई, बहन आखिर कब तक इनका ध्यान रख सकते हैं? एक न एक दिन तो इन का संकट गहराना ही है. सबसे बड़ी बात यह है कि यदि ये सत्तर व्यक्ति अकेले होते तो फिर भी किसी तरह इनकी अनदेखी करके इन्हें इनके हाल पर छोड़ा जा सकता था, किन्तु ये अकेले नहीं हैं. इनके साथ हर एक हज़ार में से सत्तर लोग और हैं. सोचिये, इस तरह एक सौ इक्कीस करोड़ में से कुल कितने पुरुष संकट में हैं. इनके लिए महिलाएं हैं ही नहीं. [हालाँकि कई लोग यह सोच कर भी खुश हो रहे होंगे कि चलो, कम से कम हर एक हज़ार में से सत्तर तो खुशनसीब रहेंगे]
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शोध
आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...
sahi kataksh.lekh ke liye aabhar.
ReplyDeletebahut-bahut dhanywad.
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