Wednesday, May 15, 2013

आइये "पीढ़ी-अंतराल" मिटायें [सात]

जब दो पीढ़ियों की  तुलना होती है, तो एक तथ्य और भी उभर कर आता है- धन का अर्जन और उसका उपभोग या खर्च। धन को खर्च करने के रवैये पर भी दो पीढ़ियाँ  अलग-अलग सोच रखती हैं।
युवा पीढ़ी  सोचती है कि  जितना है, वह सब खर्च करने के लिए ही तो है। बल्कि कभी-कभी तो युवा लोग इसके लिए भी तत्पर हो जाते हैं, कि  उधार लेकर खर्च कर लें, बाद में चुका देंगे। बेतहाशा बढ़ते लोन और अग्रिम की वित्तीय गतिविधियाँ इसी सोच का नतीजा हैं।
इसके विपरीत पुरानी पीढ़ी  इस मामले में थोड़ी कंजर्वेटिव है। जो है, वह भी पूरा खर्च डालने के लिए नहीं है। इसी में से भविष्य की आपदाओं के लिए भी बचा कर रखना है। हाथ में चार पैसे रहेंगे, तो मदद भी मिलेगी, खाली हाथ  वालों को कोई नहीं पूछता।
इस अंतर का कारण यह है कि  दोनों पीढ़ियों की जोखिम उठाने की क्षमता अलग-अलग है। यही अंतर हमें संतुष्ट या असंतुष्ट भी रखता है, माने कूल।
हाँ, कभी-कभी कुछ बुज़ुर्ग यह भी सोच लेते हैं कि  जो पास में  है उसका आनंद लिया जाए, तब उन्हें "जिंदादिल" के तमगे से नवाज़ा जाता है। कोई युवा कहता है कि  सोच-समझ कर खर्च  किया जाए, तो उसे 'कंजूस' की पदवी भी मिल सकती है।
पहले कहा जाता था कि  "पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय?" अब लोग सोचते हैं कि  धन होगा तो पूत भी सपूत होगा, धन नहीं होगा तो पूत भाग्य-भरोसे हो जाएगा।

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