Monday, May 13, 2013

आइये "पीढ़ी-अंतराल" मिटायें [पांच]

मैं छुट्टी के दिन अपने एक मित्र के यहाँ गया तो वहां माहौल बेहद मनोरंजक पाया। वे स्वयं अखबार पढ़ रहे थे, उनका पुत्र टीवी पर क्रिकेट देख रहा था, उनकी  पत्नी डाइनिंग टेबल पर बैठी फल काट रही थीं और उनकी बेटी अधलेटी होकर किसी पत्रिका में खोई हुई थी।
मेरे आगमन से सबसे पहला खलल बेटी की आराम-तलबी में  पड़ा। मेरे मित्र की पत्नी ने उसी से कहा-"बेटी, देख नहीं रही है, अंकल आये  हैं, चलो उठ कर पानी पिलाओ"
बिटिया ने अचम्भे से मेरी ओर  देखा और बोली-"अंकल, आपको प्यास  लगी है?"
उसका इतना पूछना था, कि  माहौल ने मनोरंजन को तिलांजलि देकर तल्खी का रुख अख्तियार कर लिया। उसके पिता  बोले- "कोई घर में आये तो चाय-पानी पूछते ही हैं, अतिथि अपने आप थोड़े ही मांगेगा"
बिटिया उठ कर पानी लाने चली तो गई, पर उसके जाते-जाते भी उसकी आँखों में दो सवाल मैंने पढ़ ही लिए। पहला सवाल तो ये था, कि  यदि अतिथि के आते ही उसे पानी पिलाने का रिवाज़ है, तो ये बात बेटे, अर्थात उसके भाई को क्यों नहीं सिखाई गई?
इस सवाल पर अभी हम बात नहीं करेंगे, क्योंकि यह पीढ़ी -अंतराल नहीं, स्त्री-पुरुष-भेदभाव का सवाल है।
दूसरा सवाल ये था कि क्या नाश्ता-पानी किसी के बिना कहे देने से बेहतर यह नहीं है  कि उससे पहले पूछ लिया जाए? हाँ, यह अब पीढ़ी -अंतराल की बात है। पुरानी पीढ़ी कहती है, कि जलपान किसी के बिना चाहे पेश करना "शिष्टाचार" है। नई पीढ़ी कहती है, कि पहले पूछ कर हम समय-शक्ति-सुविधा का बेहतर तालमेल कर सकते हैं।
बहरहाल, बिटिया जब पानी लाई तो मुझे सचमुच प्यास नहीं थी, पर मैंने एक घूँट केवल इसलिए भरा, कि  कहीं उससे किसी को कुछ सुनना न पड़े।       

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