Friday, May 17, 2013

आइये "पीढ़ी -अंतराल" मिटायें [नौ ]

मुझे नहीं पता कि  आप ये  बात मानेंगे या नहीं, लेकिन मेरे शोध में एक बात और आई है, जिसमें दो पीढ़ियाँ अलग-अलग बर्ताव करती हैं।
ये बात है, किसी भी रोग या शारीरिक कष्ट की अवस्था में डॉक्टर को दिखाने को लेकर। देखा गया है कि  रोग का अंदेशा होने पर या उसके चिन्ह दिखाई देने पर पुराने लोग थोड़ा ठहर कर देखने के कायल होते हैं। उन्हें लगता है कि  शरीर की कुछ प्रतिरोधक क्षमता होती है, अतः रोग शुरू होने पर पहले कुछ परहेज़ रख कर शरीर को अपना काम करने देना चाहिए। ठीक न होने पर ही दवा या डॉक्टर का सहारा लेना चाहिए। बल्कि कभी-कभी तो वे देसी घरेलू इलाज़ से काम चला लेजाने की कोशिश भी करते हैं।
इसके विपरीत नई नस्ल के युवा प्रतिरोधक क्षमता के भरोसे बैठना पसंद नहीं करते। वे घरेलू इलाज पर भी भरोसा नहीं करते। उन्हें लगता है कि  हर रोग का स्पष्ट  वैज्ञानिक कारण है, रोग होते ही डॉक्टर को दिखाया जाना चाहिए। शायद युवा पीढ़ी  इस बात से भी भली भाँति परिचित है कि  आज के मिलावट के ज़माने में घरेलू वस्तुएं और जड़ी-बूटियाँ प्रभावशाली नहीं हो सकतीं।
यद्यपि आज रोग के इलाज़ पर "बीमा" का प्रभाव भी देखा जाता है। यदि आपको इंश्योरेंस से इलाज़ का पैसा वापस मिल जाता है, तो आप महँगा इलाज़ पसंद करते हैं, पर यदि पैसा जेब से ही जाना हो तो सोच-समझ कर खर्च किया जाता है।

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