Tuesday, July 27, 2010

श्राप नहीं शुभकामनाएँ

पिछले दिनों अमेरिका के कई शहरों- वाशिंगटन, बोस्टन, बफलो, अल्बनी, पिट्सबर्ग, अटलांटिक सिटी,ट्रॉय, नेशुआ, न्यूजर्सी, ग्रोव सिटी आदि में जाने का संयोग हुआ। न्यूयॉर्क में मैं काफी समय से रह रहा हूँ। यहाँ रहते हुए मुझे हमेशा मुंबई की याद आती है, जहां मैंने जीवन के ग्यारह वर्ष गुज़ारे हैं। दिल्ली में मेरे सातवर्ष निकले हैं जिसकी स्वाभाविक तुलना वाशिंगटन से है। भारत में मैं जयपुर, जबलपुर, उदयपुर, कोटा, कोल्हापुर, ठाणे, पुणे आदि शहरों में भी रहा हूँ। भारत के लगभग सभी प्रान्तों के सैंकड़ों शहरों और गाँवों में भी मैं घूमा हूँ। मैं विभिन्न मंदिरों, मस्जिदों, चर्च, गुरुद्वारों और अन्य पूजास्थलों में भी गया हूँ। मैंने लोगों को बहुत करीब से और तरह-तरह से देखा है। तीन वर्ष पहले तो मुझे चार महीने के समय में सड़कमार्ग से ६४००० किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ी थी, जहां मैं राजस्थान प्रदेश के सभी ३३ जिलों में कई बार गया। बीच में एक राजनीतिक पार्टी के राष्ट्रीय सचिव के रूप में भी मेरी लगातार यात्राएं हुईं।
इन सब स्थानों को याद कर के मैं केवल यह कह रहा हूँ कि इंसान आधारभूत रूप से हर जगह कमोबेश एक सा ही है। सुख- सुविधाएँ मिलें तो अपने और अपनों में खोया हुआ, और कष्ट-मुसीबतें मिलें तो दूसरों की ओर देखता हुआ। सुख-सुविधा में होते हुए भी यदि अपवाद-स्वरुप लोग दूसरों की ओर देखते हुए मिलते हैं तो उन में अपनी सुख-सुविधा का प्रदर्शन करके उसे और कई गुना बढ़ा लेने की प्रवृत्ति ही अधिक दिखती है।
मैं किसी जगह के इंसान की बुराई नहीं कर रहा। फिर भी मैं मन से चाहता हूँ कि इंसान के जीवन में थोड़े कष्ट-मुसीबतें बने रहें ताकि वह दूसरों की ओर देखने की अपनी प्रवृत्ति बनाए रखे। यह इंसानियत को कोई श्राप नहीं बल्कि शुभकामनाओं जैसा है।

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