Monday, July 26, 2010

ईर्ष्या क्यों न खरीदे कोई ?

जब हम जीवन में कोई भी बड़ा काम करते हैं तो उसके परिणाम भी अलग-अलग होते हैं।
कई लोग अपनी पढ़ाई में ऊंचाइयां छूते हैं। कोई नौकरी में सफलता-दर-सफलता से गुज़रता है। कोई व्यापार में शिखर चूमता है।
कभी सोच कर देखिये, आपकी कोई भी उपलब्धि होने के बाद लोगों को कैसा लगा?
हम घर में कोई नया सामान भी खरीद कर लाते हैं तो हम फूले नहीं समाते। अपनी खुशी की लहर में वो चीज़ हम अपने मिलने वालों,पड़ोसियों या रिश्तेदारों को भी चाव से दिखाते हैं। क्या आपको लगता है कि आपकी खुशी दूसरों को भी खुश करती है?उन्हें यह अच्छा ही लगता है कि आपने कोई सफलता अर्जित की।
औरों की छोड़िये खुद अपनी बात कीजिये, क्या आप दूसरों को सफल होते देख कर खुश होते हैं? या तुरंत उनकी तुलना अपने से करने लग जाते हैं- क्या हुआ जो उन्हें यह चीज़ मिल गयी। हमें तो इससे भी अच्छी मिली थी। कहीं ऐसा तो नहीं सोचते आप?
यदि ऐसा सोचते भी हैं तो यह गलत नहीं है। क्योंकि आपकी यह सोच कोई सोची-समझी प्रतिक्रया नहीं बल्कि एक स्वाभाविक प्रतिक्रया है। मानव श्रेष्ठता की होड़ का एक मोहरा है ही। यही स्पर्धा तो जीवन में और बेहतर बनाती है। इसी से तो हम जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं।
कभी-कभी आप साफ देख लेते हैं कि दूसरे आपकी सफलता से जल रहे हैं। लेकिन फिरभी दूसरों की ईर्ष्या की वजह से हम सफल होना या सफल होने की कोशिश करना छोड़ तो नहीं सकते। क्यों छोड़ें?
हम जीवन केवल दूसरों के लिए नहीं जी रहे। हमें जो अच्छा लगता है उस पर पहला हक़ हमारा है। हमें जो वस्तु पसंद है उसे हासिल करना कोई गलत नहीं है। उलटे यदि हम दूसरों को खुश करने के लिए कोई उपलब्धि छोड़ते हैं तो वह अस्वाभाविक है।
दुनिया में कोई एक सबका जीवन अच्छा नहीं बना सकता। सबको अपना-अपना बनाना ही चाहिए। आज़ादी के लिए किसी गांधी, शान्ति के लिए किसी गौतम, मर्यादा के लिए किसी राम या प्रेम के लिए किसी कृष्ण का इंतज़ार यह युग नहीं कर सकता। सब अपनी-अपनी इबारत ठीक से लिख दें, वही बेहतर होगा।
कहते हैं-एक बार एक अध्यापक अपने विद्यार्थियों को समझा रहा था कि दुनिया में हमारा जन्म दूसरों की सेवा करने के लिए हुआ है। एक छात्र ने पूछ लिया - सर, दूसरों का किसलिए हुआ है?
यह एक सामान्य वार्तालाप है। पर देखिये, क्या आपको नहीं लगता कि छात्र के विचार यहाँ शिक्षक से ज्यादा व्यावहारिक हैं?

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