मैं नहीं जानता कि जनसंचार और पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में आजकल अखबार की परिभाषा क्या बतायी जाती है.लेकिन व्यावहारिकता के नाते देखने पर तो यही लगता है कि अखबार कागज़ के उस कैनवास को कहते हैं जो हर सुबह हमें हत्याओं ,दंगों,चोरी ,ठगी ,बलात्कार ,आगजनी,दुर्घटनाओं और नेताओं की अन्य गतिविधियों की जानकारी देता है.ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर अखबार हम क्यों पढ़ें ?
पर तभी यह भी लगता है कि अखबार हम क्यों न पढ़ें ?यह सारी हिंसा और अमानवीय कृत्य क्या हमारे आँखें मूँद लेने से ही बंद हो जायेंगे?कम से कम हम इनके बारे में जानकर इनसे बचने की जुगत तो करेंगे.हमें इनसे बचाव करने के तरीके सोचने में तो मदद मिलेगी.इससे हम में कठिनाइयों को सामूहिक रूप से सहने की क्षमता तो पैदा होगी।
जब हम कमरतोड़ महंगाई के बारे में पढ़ते हैं तो यह भी जान पाते हैं कि महंगाई सभी के लिए है.यदि पेट्रोल-डीजल की किल्लत है तो वह सभी के लिए है.अखबार हमें बता देता है कि किल्लत क्यों है,महंगाई किस कारण है,दंगे-फसाद किनके कारण हैं.अब यह बात अलग है कि सबका कारण जान कर भी हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं.हम सरकार या दूसरों के इंतज़ार में रहते हैं कि वे कुछ करें.क्या हमारी अपनी कोई भूमिका नहीं है?
सोचिये ,क्या हो सकती है आपकी भूमिका?
आप इतना तो कर ही सकते हैं कि जिस चीज़ की कमी या किल्लत है उसे किफ़ायत से काम में लें.कोई चीज़ बिना बात खर्च न करें.उसकी बर्बादी रोकने की चेष्टा करें.हो सकता है इससे आपको लगे कि कुछ नहीं होगा.एक आदमी या कुछ आदमी कुछ नहीं कर सकते।
पर ज़रा गहराई से सोचिये .सुबह के अखबार को याद कीजिये.चाहें तो उसे दुबारा पढ़िए.सारे शहर ने चोरी नहीं की है,एक-दो लोगों ने ताले तोड़े हैं.हर ट्रेन का एक्सीडेंट नहीं हुआ ,एक-दो का हुआ है.हर चीज़ की किल्लत नहीं हुई ,एक-दो चीज़ों की हुई है।
वाह,जब बर्बादी एक-दो लोग कर सकते हैं तो बर्बादी रोकने का काम कुछ लोग क्यों नहीं?आपकी भूमिका छोटी कहाँ है?
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
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