Friday, April 11, 2014

ऋतु आये फल होय

एक फिल्म में देखा था कि एक ट्रक ड्राइवर ने शराब के नशे में गाड़ी चलाते हुए एक निर्दोष आदमी की जान लेली. अदालत में मुकदमा चला. बचने का कोई कारण  नहीं था. कानून की धाराओं के चलते उम्रकैद भी दी जा सकती थी, और फांसी भी, क्योंकि जिसे मारा वह अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला था, अशिक्षित पत्नी थी, और छोटे-छोटे मासूम बच्चे.
न्यायाधीश ने एक अजीबोगरीब फैसला सुनाया. कहा-ट्रक ड्राइवर पीड़ित परिवार के साथ रहेगा, और उसका भरण-पोषण करेगा.अपराधी पश्चाताप की आग में जलता भी रहा, प्रायश्चित भी होता रहा, निराश्रित खानदान की परवरिश भी होती रही, कानून पर अन्याय के छींटे भी नहीं लगे.
फिल्म थी "दुश्मन", कलाकार थे राजेश खन्ना, मुमताज़ और मीना कुमारी.
दुष्कर्म या बलात्कार करने वाला, राक्षस है, उसे फांसी होनी ही चाहिए.लेकिन सोचिये, क्या इस से भी माकूल कोई और सजा नहीं हो सकती?
कई बार ऐसा होता आया है कि  हम जिस से आज मोहब्बत करें, उस से कल नफरत करने लगें.जिस से आज नफरत करें, उस से कल मोहब्बत करने लगें।
लेकिन यदि हमने "आज" को ज़िंदा जला दिया,तो कल की सब संभावनाएं भी दफ़न हो जाएँगी.
ये किसी भी कोण से मुलायम सिंह यादव के बयान का बचाव नहीं है.               

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