Saturday, April 19, 2014

ये जानते हुए भी कि कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगेगा

इन दिनों लिखी जा रही हिंदी लघुकथाओं में एक बात बहुत विचलित करने वाली है.बड़े पैमाने पर ऐसी रचनाएँ लिखी जा रहीं हैं, जिनमें संवेदना जगाने के लिए इंसान के बुढ़ापे की निरीहता को चित्रित किया जा रहा है, दुःख की झांकी दिखाने के लिए असाध्य रोगी पात्र दिखाए जा रहे हैं, मर्मस्पर्शी आख्यानों की लालसा में दुर्घटनाओं और उनसे उपजी रिक्तता, अनाथ हो जाने के दर्द, सुहाग उजड़ जाने के चित्रण किये जा रहे हैं.
ये सभी ऐसी परिस्थितियां हैं, जो अपरिहार्य हैं.इन पर किसी का कोई वश नहीं है.  ये होती आई हैं और आगे भी होंगी ही.
क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इनकी बात करके हम पाठक की मनुष्यता को नीचा और बेबस दिखा रहे हैं.हम पढ़ने वालों को किसी बंद गली के आखिरी मकान तक छोड़ आते हैं और वहां का वीरान घटाटोप इंसान को अपनी नज़र में चींटी बना देता है.
सार्वभौमिक दुःख को गाकर हम क्या कहना चाहते हैं?
साहित्य की पूरी कवायद चीज़ों को सुधारने के लिए जद्दो-जहद करने की है.हमें उन दीवारों से सिर  टकरा कर क्या हासिल जो कभी नहीं टूटेंगी.
यदि ऐसा करके आप नई पीढ़ी से "सहानुभूति" मांग रहे हैं तो दो बातें ध्यान रखिये-
-दैव योग से घटने वाली घटनाएँ नयी-पुरानी पीढ़ी का अंतर नहीं जानतीं.
-इनके चित्रण में आपका फोकस किसी रोगी, दिवंगत या लाचार पर न होकर हृदयहीन, न पसीजने वाले, गैर-मानवीय मूल्यों वाले पात्रों पर अधिक होना चाहिए. मोम तो यहाँ पिघलाना है.         
        

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