Sunday, April 6, 2014

अणु, कोशिका,डेल्टा, बौर

बचपन का वह दौर बहुत अच्छा होता है जब हम लंचबॉक्स लेकर स्कूल जाते हैं और बिना किसी भेद-भाव के वह सब-कुछ पढ़ते हैं जो हमें वहाँ पढ़ाया जाता है.हमें इस बात की  बिल्कुल परवाह नहीं होती कि जो कुछ खाने के डिब्बे में है, वह किस भाव का है?
आज सुबह मुझे अपना स्कूल, मित्र और उस वक़्त की पढ़ाई याद आई.
विज्ञानं के शिक्षक जब पदार्थ के अणुओं में विखंडन की बात समझाते थे, थोड़ा कठिन तो लगता था. कोशिकाओं का और-और विखंडन, विचित्र लगता था.कैसे एक सघन बहती नदी डेल्टा में आकर असंख्य धाराओं में बँट जाती है, अद्भुत लगता था. पेड़ पर बौराये फूलों का फल बनने से पूर्व ही झाड़ दिया जाना कितने सलीके से समझाते थे शिक्षक.
उन सभी शिक्षकों का लाख-लाख धन्यवाद। उन्होंने ये सब न पढ़ाया होता, तो आज न राजनीति समझ में आती, न साहित्य !          

2 comments:

  1. लौट के न आएंगे अब वे बचपन के दिन,तब जल्दी से बड़े हो कर सब कुछ पा लेने की इच्छा होती थी अब आज वापस वहां जाने की गायवक्त लौट कर नहीं आता

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  2. Jab "Mitra" baat karte hain [aap jaise] to lagta hai jaise gaya waqt aa gaya, aabhaar!

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