Monday, April 28, 2014

लो, समंदर भी मैला हो गया

लोगों की आदत बड़ी खराब होती है. सुबह-सुबह साफ़ धुला सफ़ेद झक्क रुमाल इत्र लगा कर जेब में रखते हैं, और फिर दिन के किसी भी समय मौक़ा देख कर इसे नाक से लगा कर मैला कर डालते हैं.
और तो और, गंगा तक को नहीं छोड़ा लोगों ने. इसमें अपने इतने पाप धोये कि  बेचारी गंगा भी मैली हो गई.
और अब तो हद ही हो गई.समंदर पर भी आफ़त आ गई. इसमें लहर दर लहर इतने लोग आते जा रहे हैं कि समंदर की सतह धरती से ऊपर निकली जा रही है.लेकिन लोग हैं कि  आते ही जा रहे हैं.
ज्यादा जनसँख्या वाला देश होने का यही तो नुक्सान है कि  कोई अपनी मासूमियत में यदि लोगों से कह दे कि समंदर में जा पड़ो , तो लोग आज्ञाकारी बच्चों की तरह जा-जाकर सागर में ही गिरने लग जाते हैं.
मजे की बात ये है कि समंदर इनसे ही भरा जा रहा है,जबकि ये तो केवल वे लोग हैं जिन्होंने केवल एक आदमी को वोट दिया है.
चलो अच्छा है, टीम को वोट देने वाले गिने-चुने ही निकले वर्ना धरती पर भी बेकार समंदर जितना ही बोझ बढ़ जाता.     
            

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