Sunday, April 6, 2014

निराशा और ज़िद, दोनों ही नहीं है ये

आपको बहुत से लोग जीवन में ऐसे मिलते हैं जो लगातार "जो कुछ है" उस से असंतुष्ट रहते हुए उसे बदलना चाहने, बदल न पाने की  अपनी मंशा से जूझते रहते हैं.
ऐसे लोगों पर आप दो तरह की  प्रतिक्रिया देते हैं- या तो ये लोग निराशावादी हैं जो किसी भी बात से खुश नहीं हैं, या फिर ज़िद्दी हैं कि जो कुछ है उसे बदल कर ही इन्हें चैन आता है.
एकबार सुदूर गाँव के एक दुरूह खेत पर एक वृद्ध औरत काम कर रही थी.वह सुबह जब खेत पर आई थी तो उसने भिनसारे ही अपने चौदह साल के लड़के को यह कह कर घर से प्रस्थान किया था कि खेत पर बहुत काम है. लड़के  ने उसके चले जाने के बाद नहा-धोकर चूल्हे पर रोटी बनाई, और एक कपड़े की पोटली में चार मोटी रोटी अपने लिए और दो अपनी माँ के लिए लेकर वह खेत की  ओर चल पड़ा.
जब वह खेत पर पहुंचा तो उसने देखा कि उसकी माँ ने धूप में पसीना बहाते हुए गोबर के उन सब उपलों के ढेर को उठा कर किनारे के बबूल के पेड़ के नीचे जमा कर दिया है, जिन्हें वह कल उसी पेड़ के नीचे के ढेर में से उठा-उठा कर पूरे खेत में फैला कर गया था.
वह बाल्टी उठाकर पीने का पानी भर लाने के लिए पास के कुए पर चला गया.कुए की  जगत पर उसने कपड़े  की एक पोटली टंगी देखी जिसमें सुबह-सुबह सूर्योदय से भी पहले उठ कर माँ द्वारा बना कर लाई गयी रोटियां थीं. माँ ने उससे पूछा कि क्या वह उन रोटियों को खा आया है जो माँ ने सुबह-सुबह उसके लिए बना कर रसोई के छींके पर टाँग दी थीं ? उसके पास किसी गाबदू की तरह माँ को देखे जाने के अलावा और कोई विकल्प न था. शब्दों के मितव्ययी वे माँ-बेटा अब एक-दूसरे से नाराज़ हुए, एकसाथ बैठ कर प्याज़ और रोटी खा रहे थे.           

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