Saturday, July 28, 2012

इतिहास बदलने की अनुमति है !

[मंच पर एक लम्बी, ईंटों की  दीवार दिखाई दे रही है। दीवार के सामने कालप्रहरी पहरा दे रहा है। उसके एक हाथ में टॉर्च व दूसरे  हाथ में लाठी है। वह बार-बार इधर से उधर चक्कर काट रहा है। बीच-बीच में पार्श्व से "जाग रहा हूँ" की आवाज़ और सीटी  बजने का स्वर सुनाई दे रहा है।कभी अजीब तरह का कोलाहल और कालप्रहरी के क़दमों की आहट सुनाई देती है। बीच-बीच में वह टॉर्च की रोशनी दीवार की ईंटों पर डालता रहता है, तथा ईंटों को लाठी से ठकठका कर देखता रहता है। ईंटों के पीछे इतिहास के वे लोग हैं, जो मर कर उस पार चले गए। इन्हीं में से कभी-कभी कोई किसी ईंट को हटा कर झाँकने की कोशिश करता है। वह ईंट गिरा देता है, और कालप्रहरी दौड़ कर अतीत के उस पात्र को वापस पीछे हटाकर ईंट को यथास्थान रखता है।]
पहरेदार  - (स्वतः बुदबुदाते हुए)वर्षों बीत गए। रोज़ सुबह होती है, शाम होती है, फिर रात हो जाती है।पूरा                
                  एक दिन इतिहास बन कर इस दीवार के पीछे चला जाता है, और अपने साथ ले जाता है कई ...                   
                  (सामने से 'जिजीविषा' का प्रवेश)
जिजीविषा - ऐसा कब तक चलेगा?
पहरेदार  -  तुम  कौन हो? कहाँ चली आ रही हो ...
जिजीविषा - अरे, मुझे नहीं पहचानते?
पहरेदार  - नहीं, मैं किसी भी स्त्री को नहीं पहचानता। फ़ौरन यहाँ से चली जाओ वरना  ...
जिजीविषा - वरना  क्या ?
पहरेदार  - वरना  मुझ पर यह आरोप लग जाएगा कि  मैं तुम से बातें कर रहा था ...
जिजीविषा - कौन लगाएगा आरोप, यहाँ तो कोई भी नहीं है, तुम किस से डर रहे हो ?
पहरेदार  - मैं किसी से नहीं डरता , मैंने किया ही क्या है जो मैं डरूं ...
जिजीविषा - यही तो मैं भी कह रही हूँ। 
पहरेदार  - पर तुम हो कौन ?
जिजीविषा - मैं जिजीविषा हूँ। 
पहरेदार  - तुम कहाँ रहती हो ?
जिजीविषा - कहीं भी। हर एक के दिल में ...
पहरेदार  - छी -छी -छी, कैसी बातें करती हो ?

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