Saturday, July 14, 2012

आगे बढ़ें, देखें किसके पुरखे मिलते हैं ...

...कुछ साल और गुज़रे कि  घर में कन्या-रत्न भी आ गई। साक्षात् लक्ष्मी जैसी इस कन्या का जन्म शिवरात्रि के आसपास होने से इसे शिव की अर्धांगिनी पार्वती का नाम दिया गया। पार्वती का जन्म ठीक उसी वर्ष में हुआ, जब लमही ग्राम में मुंशी प्रेमचंद का जन्म हुआ। इस महान विभूति की तरह पार्वती को भी 'पी' अक्षर से अपना नाम मिला। तीन बालकों की किलकारी से गूंजते घर में लाला उदयराम अपना पूरा ध्यान अब कारोबार में लगाते, लेकिन उनकी पत्नी अभी परिवार-वृद्धि का पटाक्षेप नहीं चाहती थीं। वे कहतीं, आँगन में चार कोण होते हैं, दिशाएँ चार होती हैं, तो संतानें भी चार क्यों न हों?
     1884 की दिवाली की रात जब लालाजी के घर एक और पुत्र जन्मा तो उसे रामस्वरूप मान कर उसका नाम भी यही रखा गया। रामस्वरूप के आने के बाद लालाजी का व्यापार खूब फलने-फूलने लगा।
     कुछ समय बाद दिलेराम का विवाह हो गया। गोविन्दराम को ईश्वर-भक्ति का ऐसा चस्का लगा कि  उसने उम्रभर शादी ही नहीं की। पार्वती मित्तल परिवार में बहू बन कर चली गई, और उसकी डोली उठने के बाद सबसे छोटे पुत्र ने लालाजी की गद्दी संभाल  ली और लाला रामस्वरूप कहलाने लगे। कलावती नाम की एक घरेलू और विदुषी महिला से उसका विवाह भी हो गया।
     पटवारी की सरकारी नौकरी में आ जाने से रामस्वरूप की दिलचस्पी ज़मीन-जायदाद में तो थी ही, पिता का आढ़त का व्यापार भी था। रामस्वरूप ने पिता की मिल्कियत  को पास के जिले अलीगढ़  तक फैला लिया और वहां के एक गाँव बरला में अपनी आलीशान हवेली बनाई।वह जितना लगाव अपनी संपत्ति से रखते थे, उससे कहीं ज्यादा अपने घर की लक्ष्मी कलावती से रखते थे। नतीजा यह हुआ कि  उनके घर सात संतानें हुईं। पांच पुत्र और दो पुत्रियों का भरा-पूरा परिवार लेकर लाला रामस्वरूप अब बच्चों की शिक्षा और परवरिश पर सोचने लगे। [...जारी] 

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