Friday, July 13, 2012

चलिए, अतीत के मेले में खोये हुए 'पुरखे' ढूंढें

किसी भी घर में, चाहे वह राजमहलों जैसा हो, चाहे झुग्गी-झोंपड़ी जैसा, कुछ ऐसे लोगों की यादें ज़रूर होती हैं, जो अब दुनिया में  नहीं रहे, लेकिन जिनके कारण उस घर की वर्तमान पीढी होती है - अर्थात परिवारके पूर्वज !
     लगभग डेढ़ सौ साल पहले 1857 में भारत में आज़ादी के लिए एक ज़बरदस्त जंग छेड़ी  गई। इस जंग में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई व तात्याटोपे जैसे कई शूरवीर जन-नायकों ने बगावत का बिगुल बजाया।
     इसी वर्ष उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर जनपद के छोटे से कस्बे बहलोलपुर में उदयराम नाम के एक बालक का जन्म हुआ। बालक ने जन्म की घड़ी  से ही युद्ध की रणभेरियाँ सुनीं। कस्बाई मानसिकता वाले साधारण  व्यवसायी परिवार के इस  बालक के मन में इस बात ने गहरा असर डाला, कि क्रांतिकारी वीरों को घर-परिवार का सुख छोड़ कर अपना सर्वस्व  न्यौछावर करना पड़  रहा है।अतः बालक ने अपनी छोटी सी आमदनी में से कुछ राशि बचा कर लगातार क्रांतिकारियों पर खर्च करने का मानस बनाया। समय के साथ क्रांति का स्वर मंद पड़ा और स्कूली पढ़ाई पूरी कर किशोर उदय विवाह के बंधन में बंधा। आदर से साथी व्यापारी अब उदय को लाला उदयराम कहने लगे।
     कुछ समय बाद लाला उदयराम की पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया। वीरों की सहायता करने के कारण उदयराम के मित्र उनकी दिलदारी से बहुत प्रभावित थे, अतः उन्होंने बेटे का नाम दिलेराम ही रख दिया। दिलेराम इसी नाम से गांवभर में लोकप्रिय हो गया। उदय और उसकी पत्नी बेटे का मुख देखते और प्रभु-भजन में ध्यान लगाते, व्यापार  अच्छा चल ही रहा था। उदय की पत्नी ने जब दूसरे  पुत्र को जन्म दिया तो बेटे का नाम भगवान  कृष्ण के नाम पर रखने की इच्छा से गोविन्द रख दिया गया। उनका गाँव मथुरा-वृन्दावन-गोकुल से कोई दूर तो था नहीं, धार्मिक आस्था का आलम यह था कि  गोविन्द के साथ भी राम जोड़ कर उसका नाम गोविन्दराम हो गया। [आगे कल ...]

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