Monday, July 16, 2012

क्या आप पक्षियों की भाषा समझते हैं?

   एक बार आते- जाते मैंने गौर किया कि सड़क के किनारे दो ऊंचे-ऊंचे सूखे पेड़ हैं।लगभग एक सी ऊंचाई है उनकी। दोनों के बीच करीब पचास फुट की दूरी होगी। यह पतझड़ के मौसम की बात नहीं है, क्योंकि इन पेड़ों के आसपास ढेर सारे हरे-भरे पेड़ भी हैं। मैं एक ख़ास कारण  से इस नज़ारे को ध्यान से देखने लगा।
   उनमें से एक पेड़ पर शाम के समय बहुत सारे पक्षी बैठे रहते हैं। वे संख्या में इतने सारे होते हैं कि  दूर से देखने पर उस पेड़ के पत्तों जैसे लगते हैं। कई बार उस पेड़ पर बैठने की बिलकुल जगह नहीं होती, फिर भी इधर-उधर से उड़ान भर कर आते परिंदे पंख फड़फड़ाते हुए जगह ढूंढते हैं, और कहीं न कहीं उसी पेड़ पर टिक जाते हैं। आश्चर्य की बात है कि  दूसरे पेड़ पर कभी कोई पक्षी नहीं बैठता।
   यहाँ तक कि  जगह न होने पर भी हर पखेरू पहले पेड़ पर ही बैठने की जद्दो-ज़हद करता है, पर दूसरे पेड़ का रुख नहीं करता। जबकि उस पर भी बैठने की उतनी ही जगह है। आप सोच रहे होंगे कि  दूसरा पेड़ कोई विषैली प्रजाति का होगा, और पहला किसी अच्छे किस्म की प्रजाति का।
   पहले मैंने भी ऐसा ही सोचा था, पर ऐसा नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि  पहले पेड़ के आसपास कोई दाना-पानी है और दूसरे  के पास बंजर जगह।
   अब मेरी उत्सुकता है कि  मैं इस पक्षपात का कारण पता लगाऊँ। मैं न पंछियों की भाषा समझता हूँ, और न ही उनका मनोविज्ञान। मैं केवल मानव मनोविज्ञान के सहारे ही यह पहेली हल करने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं जल्दी ही आपको इसका कारण  बताने का प्रयास करूंगा। इस बीच यदि आपके दिमाग में कोई 'क्लू' आता हो तो कृपया बताएं।  

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