Monday, July 23, 2012

कोई पहाड़ नहीं टूटा

मुझे याद है, एक समय ऐसा भी हुआ करता था कि  यदि किसी दिन अखबार पढ़ने को न मिले, तो दिन-भर एक अदृश्य बेचैनी सी हुआ करती थी। ऐसा लगता था कि  जैसे कोई बेहद ज़रूरी काम छूटा  रह गया। घर की रसोई में यदि पिछले सप्ताह के किसी भी दिन का अखबार रोटी के बर्तन में लग गया, तो महसूस होता था जैसे ज़रूरी कागज़ खो गया हो। यदि अखबार की रद्दी बेची जा रही हो, तो यह खास ध्यान रखा जाता था कि  ताज़ा महीने के अखबार कबाड़ी को न दिए जाएँ।
   लेकिन अब इनमें से कोई बात ध्यान नहीं खींचती। पिछले दो दिन से हॉकर्स  की स्ट्राइक के कारण अखबार नहीं मिले। लेकिन आश्चर्य है कि  कहीं किसी तरह का व्यवधान दिनचर्या में नहीं दिखा। बल्कि अब लग रहा है कि  पिछले दो दिन से सुबह की चाय काफी इत्मीनान से पी जा रही है।
   क्या यह प्रिंट मीडिया के दम तोड़ने के दिन हैं? क्या इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने प्रिंट मीडिया को पूरी तरह हाशिये पर खिसका दिया? क्या छपे शब्द ने अहमियत और विश्वसनीयता खो दी ? क्या विज्ञापनों, पेड न्यूज़ और प्रकाशन-घरानों की आपाधापी ने कागज़ को "अन्यत्र" इस्तेमाल के लिए आज़ाद कर दिया?
   घर पर अखबार नहीं आया, और ऐसा नहीं लगा कि  कहीं कोई पहाड़ टूट पड़ा हो... 

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