Sunday, April 22, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [भाग 48 ]

     इतना भयंकर तूफ़ान पिछले कई सालों से नहीं आया था. बफलो पर से तो इस तूफ़ान ने केवल ठंडी कंटीली हवाओं के तीर छोड़े थे लेकिन देश के और कई हिस्सों में इसने भीषण तबाही मचाई थी. नायग्रा झरना उस कांपती रात में ठिठुर कर रह गया था. बर्फीले अंधड़ के उन्मत्त विहार ने जगह-जगह जान-माल का नुकसान भी किया था. लोगों ने कई टूटे घरौंदों  के क्रूर चित्र अख़बारों में देखे. कई इलाके अंधकार में डूब गए. 
     इस तूफ़ान ने हजारों मील दूर म्यांमार में भी खलबली पैदा की. लोग यह जान कर सन्न रह गए कि अमेरिका में रह रहे  वे नामी-गिरामी संतजी जिनके बरसों पुराने आश्रम को लोग पूजने की हद तक महान मान कर गौरवान्वित  होते थे, इस क्रुद्ध ज़लज़ले का शिकार हो गए. पहाड़ी-स्थान पर बना उस आश्रम का अहाता पूरी-तरह छिन्न-भिन्न हो गया. गिरी दीवारों और बिखरे असबाब के बीच  इस आश्रम में रहने वाले 'बाबा' जिनकी आयु सौ वर्ष से भी अधिक बताई जाती थी,न जाने कहाँ अंतर्ध्यान हो गए. भारत और म्यांमार के साथ-साथ अमेरिका ने भी हताहतों को भारी राहत मुहैय्या कराई.इस बात पर भी कयासों और अटकलों का बाज़ार गर्म रहा, कि संतजी और वयोवृद्ध बाबा जीवित बचे या काल-कवलित हो गए.आश्रम की अकूत संपत्ति क्षत-विक्षत  हो गई और उसे दूतावासों के ज़रिये सरकारी स्वामित्व में ले लिया गया. 
    कल तक लोगों को उनका भवितव्य बता रही ज़मीन  आज अपने भवितव्य की सलामती की मुहताज हो गई. 
    पानियों में बहते डूबे किनारों को आंसुओं के साहिल  देने वालों में नार्वे की एमरा भी थी, वर्जीनिया की अगाथा भी, अज़रबैजान का सांझा भी, और डेनमार्क का प्रिंस  भी.
     जो बच न सका, वह तो बचा ही नहीं, जो बच गया, उसका कुछ न बचा.सागर में इतनी ऊंची-ऊंची लहरें उठी, कि नाराज़ होकर अगली सुबह मछलियों ने धूप  की सूरत तक न देखी. गहरे पानी में छिपी रहीं.
     ऐसा लगा, जैसे दुनिया के स्टीयरिंग पर बैठे खुदा को झपकी आ गई, और संसार की गाड़ी किसी गहरे गड्ढे पर जोर से उछल गई. लेकिन जैसे जंगल में मवेशियों का झुण्ड कोई मुसीबत टूट पड़ने पर अपने चरवाहे को भी बचाता है, वैसे ही, खुदा के ही कई बन्दों ने बढ़-चढ़ कर खुदा की मदद की. उस रात की भी सुबह होकर रही.
     किन्ज़ान और पेरिना अख़बार के पन्नों को छू-छू कर पश्चाताप करते रहे. और याद करते रहे बरसों पहले गुजरी अपने हनीमून की रात...
     लेकिन जल्दी ही उस नशीली रात की याद की खुमारी उन्हें छोड़नी पड़ी, क्योंकि सामने कॉलेज से लौटी आदमकद बिटिया डेला जो खड़ी थी.उसे क्या मालूम कि तूफ़ान की ख़बरों ने उसके माता-पिता के मानस नगर के कौन से चौराहे पर पुंगी बजा दी? वे आवाजें तो दोनों के अंतर पुर में सोहर गा रही थीं, डेला को इससे क्या?
     तूफ़ान की याद में कई ख़ुशी के उत्सव निरस्त होने की ख़बरें अख़बार में थीं, उन्हीं की तरह किन्ज़ान और पेरिना ने भी  अपने मन में खिले बाग़ निरस्त कर लिए...[जारी...]         

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