Tuesday, April 10, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [भाग 34 ]

     ...भी एक न एक दिन ज़रूर सच होता.
     सपने आँखों में लकीर छोड़ जाते हैं. जब तक पूरे न हों, आँखों में नींद के साम्राज्य को जमने नहीं देते. किन्ज़ान ने भी नसीब को पड़ाव दिया था, आत्म-समर्पण नहीं. कुछ दिन बाद वह बूढ़ा, किन्ज़ान का मामा और रस्बी का सौतेला  भाई वापस लौट गया.
     किन्ज़ान ने एक दिन अपने घर के भीतर एक बहुत विचित्र बात नोट की. उसने देखा, कि घर में अकेले उसके रहते हुए भी जब-तब ऐसी बातें होती हैं, जिनकी जानकारी उसे नहीं होती. एक सुबह उसने अपने फ्रिज़ में कुछ ऐसी चीज़ें रखी देखीं, जो वह खुद कभी नहीं लाया था. उसने बहुत दिमाग दौड़ाया कि ऐसा कैसे हो सकता है?
     कहीं ऐसा तो नहीं, कि किन्ज़ान की याददाश्त कमज़ोर हो गई हो? वह बाज़ार से कुछ चीज़ें ले आया हो, और उसे खुद यह याद न रहा हो. बुढ़ापे में तो फिर भी ऐसा होना कोई अनोखी बात नहीं मानी जाती, पर किन्ज़ान तो अभी नौजवान था. उस से भला ऐसी भूल-चूक कैसे हो सकती है? किन्ज़ान का मित्र अर्नेस्ट जब आता तो किन्ज़ान सोचता कि उसे इस बारे में बताये. पर वह कुछ सोच कर रुक जाता. वैसे भी, युवावस्था में अपने दोस्तों को भी अपना मखौल उड़ाने का मौका कोई दोस्त नहीं देता.
     और क्या, ऐसी बात सुन कर कोई भी किन्ज़ान का मज़ाक ही तो उड़ाता?
     लेकिन धीरे-धीरे किन्ज़ान को लगा कि यह अवश्य कोई गंभीर बात है. ऐसा अक्सर होने लगा. किन्ज़ान सुबह उठता तो ध्यान देता कि उसके बिस्तर के किनारे पानी की बोतल रखी हुई है. जबकि वह अच्छी तरह सोचता कि उसने पानी वहां नहीं रखा था. हाँ, नहीं ही रखा था.
     कभी-कभी किन्ज़ान को थोड़ा भय भी लगता, यह सब क्या है? इन बातों से उसे कभी कोई नुक्सान नहीं हुआ, किन्तु कोई भी ऐसे घर में भला कैसे रह सकता है, जिसमें वह होता हो जो आप न करें. खासकर तब जबकि घर में केवल आप ही रहते हों.
     किन्ज़ान अब घर में कम से कम देर रहने की कोशिश करता, वह अपना समय मित्रों के साथ बिताता. फिर अब उसने इस बारे में भी गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया था, कि वह कोई काम करे. उसे यह ख्याल आता कि उसकी माँ रस्बी उसे सेना में भेजना चाहती थी. लेकिन सेना से अब उसका मन उचाट हो गया था.
     उसने बफलो में ही कोई छोटा-मोटा कारोबार करने की सोची. मुख्य सड़क से थोड़ा हट कर एक गली में पर्यटकों को पसंद आने वाले छोटे-मोटे सामान की छोटी सी दूकान जमाने में उसे ज्यादा परेशानी नहीं आई. किन्ज़ान के स्टाल पर खरीदारों की अच्छी आवक-जावक होती थी. इससे उसे ज्यादा कुछ सोचने का अवसर नहीं मिलता था,लेकिन जब भी वह थोड़ा फुर्सत में होता तो यह देखता कि उसकी दुकान से वह मशहूर झरना- नायग्रा फाल्स साफ़ दिखाई देता था.कभी-कभी मन ही मन किन्ज़ान यह सोच कर मुस्करा देता कि बर्फीले सफ़ेद पानी का यह तूफ़ान सांस की तरह उसके जीवन से कैसे जुड़ गया है...[जारी...]    

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