Monday, April 16, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 42 ]

     जिसे पेरिना आसान काम समझ रही थी, वह इतना आसान था नहीं. वह महिला इतनी जल्दी चुप हो जाने को कतई तैयार नहीं थी. लिहाज़ा पेरिना को उससे कई बातें और भी पता चलीं. उसने बताया कि आश्रम शुरू होने के समय जिन जर्जर और कृशकाय वृद्ध को लाया गया था, वे तो अब जीवित नहीं हैं, किन्तु अब भी सौ वर्ष से अधिक आयु के एक महात्मा वहां मौजूद हैं, जिन्हें आश्रम के बेसमेंट की एक छोटी कोठरी में रखा गया है. ये नाममात्र का भोजन करते हैं, और निर्वस्त्र रहते हैं. कोठरी एक प्राकृतिक गुफा की शक्ल में है, और यह बाबा पहली नज़र में किसी को भी पागल नज़र आते हैं. लेकिन असलियत यह है कि इन्हीं के ज्ञान से हमारे संतजी चारों दिशाओं में नाम कमा रहे हैं.
     ऐसा कहते ही महिला ने बेबसी से चारों ओर देखा, कि कहीं उनकी बात कोई सुन न रहा हो.
     पेरिना की इच्छा हुई कि वह  चाहे आश्रम के मुख्य संतजी से मिले या न मिले, किन्तु उस वृद्ध महात्मा को एक नज़र ज़रूर देखे. अब पेरिना की दिलचस्पी उन बाबा के बारे में और जानने में  हुई.
     कुछ देर बाद पेरिना को किन्ज़ान सामने से आता हुआ दिखा.वह उसे ही ढूंढता हुआ पिछवाड़े चला आया था.
     वृद्ध महिला से इतनी देर की आत्मीयता ने पेरिना को यह साहस दे दिया कि वह बाबा से मिलने की अपनी इच्छा के बारे में उसे बता दे.
     कुछ सोच कर महिला उन्हें बाबा के पास ले जाने के लिए तैयार हो गयी. लेकिन पेरिना को उसकी यह विचित्र शर्त माननी पड़ी कि बाबा, क्योंकि महिलाओं से नहीं मिलते हैं, उसे किन्ज़ान के साथ मुलाकात के दौरान उन्हें छिप कर देखना होगा. किन्ज़ान को वह कुछ संकोच के बाद जोखिम उठा कर भी मिलवाने के लिए तैयार हो गई.
     महिला को स्वयं भी वहां जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उसने बगीचे में काम कर रहे एक लड़के को किन्ज़ान के साथ भेजने का बंदोबस्त किया. वह महिला और पेरिना दूसरी ओर से एक छोटे झरोखे से बाबा के दर्शन के लिए छिप गयीं.
     बाबा को देखना आसान न था.लड़के के पीछे जाते किन्ज़ान को ऐसा महसूस हो रहा था, कि जैसे वह किसी ज़ू में शेर को देखने जा रहा हो. पिंजरे में घूमता शेर दर्शकों के सामने आये, या न आये, यह शेर पर निर्भर था. इस बात का कोई महत्त्व न था कि दर्शक कहाँ से आया है, या उसने ज़ू देखने का टिकट लिया है. आश्रम की कई कंदराओं के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुज़र कर किन्ज़ान उस लड़के के साथ बाबा की गुफ़ा के करीब पहुंचा.
     बाबा उस समय दरवाज़े की ओर पीठ किये आसमान की दिशा में हाथ उठाये था. दोनों युवक खामोशी और श्रद्धा के साथ चुपचाप खड़े होकर बाबा के इस तरफ देखने का इंतज़ार करने लगे.उधर ऊपर की ओर से एक  धूप की छोटी सी  टॉर्च ज़मीन से गुफ़ा की दिशा में पड़ रही थी, जिसमें से सांस रोक कर पेरिना और वह बूढ़ी महिला झांक रही थीं.उन्हें अब तहखाने की उस  कोठरी का एक हिस्सा तो दिख रहा था, पर बाबा के शरीर का कोई भी भाग नहीं दिखाई दिया था.
     युवक ने किन्ज़ान को बताया कि जब बाबा इधर देखें, तो वह उन्हें प्रणाम न करे. ऐसा करने से क्या होगा, यह पूछते ही...[जारी...]         

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