Thursday, April 19, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [भाग 45 ]

     बाबा से मिलने के लिए बूढ़ी महिला,एमरा उस शर्त को मानने के लिए भी तैयार थी, जिसकी वज़ह से संतजी ने महिलाओं का बाबा से मिलना निषिद्ध घोषित किया था. उसे तो हर कीमत पर पेरिना की मदद करनी थी. उसका दिल भीतर से यह कहता था कि वह ऐसा करे.
     लेकिन उसके बाद सालों गुज़र गए, न किन्ज़ान वहां आया, और न ही पेरिना. 
     शायद वे दोनों ही उन बातों को भूल गए कि वे आश्रम में किस मकसद से गए थे. उन्हें केवल यह याद रहा, कि उनकी शादी के बाद ये उनका हनीमून ट्रिप था, जो बहुत आनंद-दायक रहा. बफलो पहुँच कर वे दोनों अपनी गृहस्थी में खो गए, और किन्ज़ान जी-जान से अपने कारोबार में जुट गया. 
     कभी गाहे-बगाहे उसके मन में अपने सपने का ख्याल आता भी, तो वह यही सोचता कि उसे अपने बचपन की अभिलाषा किसी संत-महंत के मंत्र- तावीज़ से नहीं, अपने जीवट और हौसले से पूरी करनी है.
     किन्ज़ान उम्र और अनुभव के साथ समझ भी प्राप्त कर रहा था. वह सोचता, यदि ये महाज्ञानी लोग अपने ज्ञान और टोने-टोटके से लोगों का जीवन सुधारने की क्षमता रखते हैं, तो फिर ये संपन्न मुल्कों में क्यों चले आते हैं? ये अपने उन पिछड़े देशों में ही  रह कर काम क्यों नहीं  करते, जहाँ विपन्नता के कारण इनकी ज़रुरत है.
     और तब इनके ज्ञान पर लगा प्रश्न-चिन्ह ऐसा लगता, मानो दाल में कुछ काला हो.
     कुछ भी हो, पेरिना की दिलचस्पी कीमती, हरे, पन्नों में बढ़ गई. वे जब शहर में किसी एशियाई या भारतीय परिवार को देखती, तो विवाहिताओं  के हाथ में पड़ी हरे कांच की चूड़ियाँ उसे आकर्षित करतीं. बल्कि कभी-कभी तो चूड़ियाँ और पन्ना जड़ी अंगूठी वह भी पहनती, जिसे उसने अपनी यात्राओं के दौरान ढूंढ ही लिया था. 
     पेरिना के मन में एक फांस और चुभ कर रह गई थी. उसे वह केसरिया सुनहरी  मछली भी कभी नहीं भूलती थी, जो बाबा ने अकस्मात किन्ज़ान के पीछे भाग कर उसकी जेब से निकाली थी. 
     और उस दिन किन्ज़ान के साथ बोस्टन में घूमते हुए उसने विशाल-काय मछलीघर देखा तो उसकी याद और ताज़ा हो गई. इस शानदार व अत्याधुनिक एक्वेरियम में उसकी आँखें अपनी चिर-परिचित उसी मछली को तलाश करती रहीं. जब किन्ज़ान एक से एक अद्भुत मछली को निहारता हुआ   आगे बढ़ता, पेरिना दीवारों पर  लिखी इबारतों और चार्टों तक को पढ़ती, कि शायद उसे अपनी उस  चिर-परिचित केसरिया  सुनहरी मछली का कोई सुराग मिले, जिसने  पेरिना के मन में शंका का बीज डाल कर जिज्ञासा का खेत उगा दिया था.
     एक्वेरियम के सबसे ऊपरी तल पर जब  सागर के एक जीवंत हिस्से में तैरते हुए एक युवक और युवती आये, तो पेरिना का दिल चाहा, कि वह भी उनकी तरह ठन्डे पानी में उतर कर गहराई का चप्पा-चप्पा छाने, और किन्ज़ान की जेब में मिली मछली का प्रतिरूप ढूँढे.
     दुनिया का कोई देश हो, किसी नस्ल के लोग हों, किसी उम्र के जीवन साथी हों, अपने पति की जेब की जानकारी जैसे  हर पत्नी का शायद पहला कर्तव्य होता हो...[जारी...]       

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