Tuesday, April 3, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 28 ]

     ...और तीखी आवाज़ आई, जैसे किसी ने नौका पर रिवाल्वर की गोलियों से वार किया हो.वार इतना आक्रामक था, कि बुलेट-प्रूफ परदे पर पड़ी खरोंच किसी ब्लेड की तरह एक ओर से परदे को चीर गई. पहले एक गोली चली, फिर कुछ रुक कर तीन-चार गोलियों की आवाज़ आई.
     बहते पानी में भागती नौका का जो हिस्सा खुला, उसके बाहर की ओर पलटते ही छोटा कुत्ता एक भय-मिश्रित चीत्कार के साथ उछलकर पानी में बाहर जा गिरा.बिजली की सी गति से किन्ज़ान ने बेल्ट हटा कर पानी में कूदने में पल का हजारवां हिस्सा भी नहीं गंवाया. उसे अपने मिशन की शुरुआत पर अमेरिकी महिला के कहे शब्द शायद आकाश से हुई वाणी की तरह कौंध कर सुनाई दे गए- "मैं अपना बेटा ही नहीं, अपनी जिंदगी का एक भाग तुम्हें दे रही हूँ..."
   कुशल तैराक किन्ज़ान ने झपट कर कुत्ते को हाथों में पकड़ लेने के बाद तेज़ी से दूर जाती नौका की ओर एक हसरत-भरी नज़र डाली, जो किसी आकाश में उड़ते विमान की तरह तेज़ी से ओझल हो गई. किन्ज़ान साँझ के झुटपुटे में तैर कर उदासी में डूबा किनारे आया. निढाल होकर बैठ जाने के बाद , अब उसका माथा यह सोच कर चकरा रहा था, कि उस पर गोलियों से वार करने वाला भला कौन हो सकता है?
     उसकी न तो किसी से दुश्मनी थी, और न ही उसके अभियान से किसी और को कोई नुक्सान होने वाला था. उसकी माँ रस्बी ने आज सुबह ही गुस्से में उसे प्लेट खींच कर ज़रूर मारी थी, परन्तु यह वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि माँ उस पर ऐसा कातिलाना हमला कभी कर सकती हैं.माँ को तो यह भी पता नहीं था, कि वह इस समय कहाँ है? वह तो कुछ भी बता कर घर से नहीं आया था. फिर माँ की जिंदगी में पिस्तौल उसने कभी देखी तो क्या, सुनी तक न थी.फिर भी उसे इस घड़ी में माँ याद आई. वह तेज़ी से घर पहुँच कर माँ की गोद में आराम करना चाहता था. माँ के हाथ से कुछ खाना चाहता था, और उसे यह भरोसा दिलाना चाहता था कि यदि वह न चाहेगी, तो वह ऐसी यात्रा पर फिर कभी न जायेगा.
     सुबह माथे में लगी चोट भी पानी में भीग जाने के बाद और तीखी होकर उभर आई थी. एक हाथ में छोटे कुत्ते को उठाये, वह हथेली से ज़मीन का सहारा लेकर जैसे ही उठा, उस वीराने में उसका सामना उसी ठिगने बूढ़े से हुआ जो अपनी लम्बी दाढ़ी के कारण इस समय भी किन्ज़ान को फ़ौरन पहचान में आ गया.बूढ़ा आते ही  किन्ज़ान से लिपट गया, और जोर-जोर से रोने लगा. इतने बूढ़े आदमी को बच्चों की तरह फूट-फूट कर इस तरह रोते हुए, किन्ज़ान ने तो क्या, किसी ने कभी न देखा था.
     किन्ज़ान भौंचक्का रह गया. उसे यह सारा माज़रा बिलकुल समझ में नहीं आया. बूढ़ा रोने के साथ-साथ तेज़ी से काँप भी रहा था. जैसे ही उसने कहा, कि किन्ज़ान की नौका पर गोली उसने चलाई थी, किन्ज़ान ने हाथ के कुत्ते को एक ओर रखा और पूरी ताकत से बूढ़े पर वार किया. पहला मुक्का पड़ते ही बूढ़े के होठों से खून का फव्वारा छूट पड़ा. पर इतने से किन्ज़ान रुका नहीं, उसने मुक्कों और लातों की झड़ी लगा दी. [जारी...]

2 comments:

सेज गगन में चाँद की [24]

कुछ झिझकती सकुचाती धरा कोठरी में दबे पाँव घूम कर यहाँ-वहां रखे सामान को देखने लगी। उसकी नज़र सोते हुए नीलाम्बर पर ठहर नहीं पा रही थी। उसके ...

Lokpriy ...