Thursday, August 2, 2012

इतिहास बदलने की अनुमति है [तीन]

[दीवार में एक छेद  दिख रहा है, जिस से लगता है कि  एक ईंट वहां से निकल कर गिर पड़ी है। बेहोश पड़ी जिजीविषा के मुंह पर पानी के छींटे मार रहा कालप्रहरी पलट कर वहां देखता है, फिर
जिजीविषा को वहीँ छोड़ कर तेज़ी से दीवार की ओर  भागता है। वह ईंट को हाथ में उठा लेता है
और उसे फिर से उसकी जगह पर रखने की कोशिश करता है। इतने में ही दीवार के पीछे से हंसने
की आवाज़ आती है]
पहरेदार  - कौन है ? कौन है वहां...
आवाज़-      मुझे नहीं पहचाना ? पहचानेगा भी कैसे, मुझे तूने देखा ही कहाँ है? जब मैं जिंदा था, तब तू पैदा भी  
                   नहीं हुआ था। अब मैं मर चुका हूँ ...
पहरेदार  - मर चुके हो तो बाहर क्यों निकल रहे हो ...चलो, चलो अन्दर।
                  [इतने में ही जिजीविषा जाग जाती है, और जोर जोर से 'कालू' 'कालू' चिल्लाने लगती है।
पहरेदार  - कालू? ये कालू कौन है? किसे पुकार रही हो तुम !
जिजीविषा- तुम्हें, और किसे !
पहरेदार  - मुझे? पर तुमसे किसने कहा कि  मेरा नाम कालू है। मैं कालप्रहरी  हूँ ...
जिजीविषा- कितना बड़ा नाम है- मैं तो तुम्हें ...
पहरेदार  - अरे पर तुम यहाँ रुकीं क्यों? तुम्हें कोई देख लेता तो ?
जिजीविषा- ओ हो, तुम्हीं तो कह रहे थे कि  यहाँ बरसों से कोई नहीं आता...अरे हाँ, उसका क्या हुआ ? वो कौन  
                  आया था यहाँ ? जिसने ईंट गिरा कर यहाँ लाल रोशनी कर दी थी ...
पहरेदार  - लगता है वह आत्मा तो शांत हो कर वापस चली गई ..तुम वैसे ही डर कर बेहोश हो गईं थीं।           [मंच पर तभी कुछ बच्चों का प्रवेश होता है। वे नारे लगाते हुए आ रहे हैं। उन्होंने हाथ में एक बड़ा
सा बैनर उठा रखा है, जिस पर लिखा है- "ममता बचाओ मंच", तेज़ शोर के साथ नारों की आवाजें
आ रही हैं- अपना हक़ लेकर रहेंगे ...अपना हक़ लेकर रहेंगे ...कालप्रहरी  दौड़कर बच्चों को रोकने
की कोशिश करता है, ]... 

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