Monday, January 2, 2012

इस देश ने देखे हैं प्रजा वत्सल शासक

बरसों पहले एक राजा था, जिसकी रानी सुन्दर न थी. राजा ने एक दूर देश की राजकन्या के रूप के चर्चे सुने और वह वेश बदल कर उसकी तलाश में निकल गया. रानी महल में अकेली रह गई.
रानी विरह वेदना में जलती, और महल की छत पर बैठी जिस-तिस को अपना दुखड़ा सुनाती. एक दिन उसने एक कौवे और भंवरे को रोक कर उनसे निवेदन किया कि वे राजा  के पास जाएँ,और उनसे कहें कि महल में एक स्त्री के जलते रहने से धुआं उठता है, जिससे उनका बदन काला पड़ गया है,राजा अपनी प्रजा का बहुत ख्याल रखने वाले हैं, वे ज़रूर कुछ करेंगे.
ऐसे कथानक आज एक बार फिर प्रासंगिक हो गए हैं, क्योंकि अब राजा न तो प्रजा के भूखे रहने की चिंता करते हैं, और न उसके इकट्ठे होकर 'न्याय-न्याय' चिल्लाने की.
एक नया साल हमें और मिल गया है. हमें कुछ आशाएं और मिल गई हैं. हमें कुछ सपने और मिल गए हैं. आइये, अपने भीतर बैठे चितेरे का आह्वान करें कि वह इन सपनों में रंग भरने के लिए अपनी तूलिका उठाये. अपने मन के भीतर बैठे सुर-साज़ को जगाएं, कि वह कोई नया राग गाये.  

1 comment:

  1. जी, वह ज़माना और था, ये ज़माना और है। नववर्ष की शुभकामनायें!

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